गजेंद्र मोक्ष स्त्रोत

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्रम् हिन्दू धर्म के सबसे प्रभावशाली स्तोत्रों में से एक है, जो शरणागति (पूर्ण समर्पण) और ईश्वर की कृपा का साक्षात प्रतीक है। यह स्तोत्र मानसिक शांति, आध्यात्मिक सुरक्षा, और जीवन संघर्षों से मुक्ति के लिए अत्यंत पूजनीय बना हुआ है।

यह लेख उन सभी पाठकों के लिए है जो पूछते हैं:

  • गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र क्या है?

  • इसका पाठ कैसे और क्यों करें?

  • क्या इससे मोक्ष या मानसिक शांति मिलती है?

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र इन हिंन्दी

श्री गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ हिंदी मैं अनुवाद सहित

श्री शुक उवाच – श्री शुकदेव जी ने कहा

एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम ॥१॥

बुद्धि के द्वारा पिछले अध्याय में वर्णित रीति से निश्चय करके तथा मन को हृदय देश में स्थिर करके वह गजराज अपने पूर्व जन्म में सीखकर कण्ठस्थ किये हुए सर्वश्रेष्ठ एवं बार बार दोहराने योग्य निम्नलिखित स्तोत्र का मन ही मन पाठ करने लगा ॥१॥

गजेन्द्र उवाच गजराज ने (मन ही मन) कहा –

ऊं नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥१॥

जिनके प्रवेश करने पर (जिनकी चेतना को पाकर) ये जड शरीर और मन आदि भी चेतन बन जाते हैं (चेतन की भांति व्यवहार करने लगते हैं), ‘ओम’ शब्द के द्वारा लक्षित तथा सम्पूर्ण शरीर में प्रकृति एवं पुरुष रूप से प्रविष्ट हुए उन सर्व समर्थ परमेश्वर को हम मन ही मन नमन करते हैं ॥२॥

यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं ।
योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम ॥३॥

जिनके सहारे यह विश्व टिका है, जिनसे यह निकला है , जिन्होने इसकी रचना की है और जो स्वयं ही इसके रूप में प्रकट हैं – फिर भी जो इस दृश्य जगत से एवं इसकी कारणभूता प्रकृति से सर्वथा परे (विलक्षण ) एवं श्रेष्ठ हैं – उन अपने आप – बिना किसी कारण के – बने हुए भगवान की मैं शरण लेता हूं ॥३॥

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं
क्कचिद्विभातं क्क च तत्तिरोहितम ।

अविद्धदृक साक्ष्युभयं तदीक्षते
स आत्ममूलोवतु मां परात्परः ॥४॥

अपने संकल्प शक्ति के द्वार अपने ही स्वरूप में रचे हुए और इसीलिये सृष्टिकाल में प्रकट और प्रलयकाल में उसी प्रकार अप्रकट रहने वाले इस शास्त्र प्रसिद्ध कार्य कारण रूप जगत को जो अकुण्ठित दृष्टि होने के कारण साक्षी रूप से देखते रहते हैं उनसे लिप्त नही होते, वे चक्षु आदि प्रकाशकों के भी परम प्रकाशक प्रभु मेरी रक्षा करें ॥४॥

कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो
लोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु ।

तमस्तदाsssसीद गहनं गभीरं
यस्तस्य पारेsभिविराजते विभुः ॥५॥

समय के प्रवाह से सम्पूर्ण लोकों के एवं ब्रह्मादि लोकपालों के पंचभूत में प्रवेश कर जाने पर तथा पंचभूतों से लेकर महत्वपर्यंत सम्पूर्ण कारणों के उनकी परमकरुणारूप प्रकृति में लीन हो जाने पर उस समय दुर्ज्ञेय तथा अपार अंधकाररूप प्रकृति ही बच रही थी। उस अंधकार के परे अपने परम धाम में जो सर्वव्यापक भगवान सब ओर प्रकाशित रहते हैं वे प्रभु मेरी रक्षा करें ॥५॥

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-
र्जन्तुः पुनः कोsर्हति गन्तुमीरितुम ।

यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो
दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥६॥

भिन्न भिन्न रूपों में नाट्य करने वाले अभिनेता के वास्तविक स्वरूप को जिस प्रकार साधारण दर्शक नही जान पाते , उसी प्रकार सत्त्व प्रधान देवता तथा ऋषि भी जिनके स्वरूप को नही जानते , फिर दूसरा साधारण जीव तो कौन जान अथवा वर्णन कर सकता है – वे दुर्गम चरित्र वाले प्रभु मेरी रक्षा करें ॥६॥

दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम
विमुक्त संगा मुनयः सुसाधवः ।

चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने
भूतत्मभूता सुहृदः स मे गतिः ॥७॥

आसक्ति से सर्वदा छूटे हुए , सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मबुद्धि रखने वाले , सबके अकारण हितू एवं अतिशय साधु स्वभाव मुनिगण जिनके परम मंगलमय स्वरूप का साक्षात्कार करने की इच्छा से वन में रह कर अखण्ड ब्रह्मचार्य आदि अलौकिक व्रतों का पालन करते हैं , वे प्रभु ही मेरी गति हैं ॥७॥

न विद्यते यस्य न जन्म कर्म वा
न नाम रूपे गुणदोष एव वा ।

तथापि लोकाप्ययाम्भवाय यः
स्वमायया तान्युलाकमृच्छति ॥८॥

जिनका हमारी तरह कर्मवश ना तो जन्म होता है और न जिनके द्वारा अहंकार प्रेरित कर्म ही होते हैं, जिनके निर्गुण स्वरूप का न तो कोई नाम है न रूप ही, फिर भी समयानुसार जगत की सृष्टि एवं प्रलय (संहार) के लिये स्वेच्छा से जन्म आदि को स्वीकार करते हैं ॥८॥

तस्मै नमः परेशाय ब्राह्मणेsनन्तशक्तये ।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्य कर्मणे ॥९॥

उन अन्नतशक्ति संपन्न परं ब्रह्म परमेश्वर को नमस्कार है । उन प्राकृत आकाररहित एवं अनेको आकारवाले अद्भुतकर्मा भगवान को बारंबार नमस्कार है ॥९॥

नम आत्म प्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥१०॥

स्वयं प्रकाश एवं सबके साक्षी परमात्मा को नमस्कार है । उन प्रभु को जो नम, वाणी एवं चित्तवृत्तियों से भी सर्वथा परे हैं, बार बार नमस्कार है ॥१०॥

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
नमः केवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥११॥

विवेकी पुरुष के द्वारा सत्त्वगुणविशिष्ट निवृत्तिधर्म के आचरण से प्राप्त होने योग्य, मोक्ष सुख की अनुभूति रूप प्रभु को नमस्कार है ॥११॥

नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुण धर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥१२॥

सत्त्वगुण को स्वीकार करके शान्त , रजोगुण को स्वीकर करके घोर एवं तमोगुण को स्वीकार करके मूढ से प्रतीत होने वाले, भेद रहित, अतएव सदा समभाव से स्थित ज्ञानघन प्रभु को नमस्कार है ॥१२॥

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
पुरुषायात्ममूलय मूलप्रकृतये नमः ॥१३॥

शरीर इन्द्रीय आदि के समुदाय रूप सम्पूर्ण पिण्डों के ज्ञाता, सबके स्वामी एवं साक्षी रूप आपको नमस्कार है । सबके अन्तर्यामी , प्रकृति के भी परम कारण, किन्तु स्वयं कारण रहित प्रभु को नमस्कार है ॥१३॥

सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासय ते नमः ॥१४॥

सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं उनके विषयों के ज्ञाता, समस्त प्रतीतियों के कारण रूप, सम्पूर्ण जड-प्रपंच एवं सबकी मूलभूता अविद्या के द्वारा सूचित होने वाले तथा सम्पूर्ण विषयों में अविद्यारूप से भासने वाले आपको नमस्कार है ॥१४॥

नमो नमस्ते खिल कारणाय
निष्कारणायद्भुत कारणाय ।

सर्वागमान्मायमहार्णवाय
नमोपवर्गाय परायणाय ॥१५॥

सबके कारण किंतु स्वयं कारण रहित तथा कारण होने पर भी परिणाम रहित होने के कारण, अन्य कारणों से विलक्षण कारण आपको बारम्बार नमस्कार है । सम्पूर्ण वेदों एवं शास्त्रों के परम तात्पर्य , मोक्षरूप एवं श्रेष्ठ पुरुषों की परम गति भगवान को नमस्कार है ॥१५॥ ॥

गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपाय
तत्क्षोभविस्फूर्जित मान्साय ।

नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-
स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥१६॥

जो त्रिगुणरूप काष्ठों में छिपे हुए ज्ञानरूप अग्नि हैं, उक्त गुणों में हलचल होने पर जिनके मन में सृष्टि रचने की बाह्य वृत्ति जागृत हो उठती है तथा आत्म तत्त्व की भावना के द्वारा विधि निषेध रूप शास्त्र से ऊपर उठे हुए ज्ञानी महात्माओं में जो स्वयं प्रकाशित हो रहे हैं उन प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ ॥१।६॥

मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय
मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोsलयाय ।

स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत-
प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥१७॥

मुझ जैसे शरणागत पशुतुल्य (अविद्याग्रस्त) जीवों की अविद्यारूप फाँसी को सदा के लिये पूर्णरूप से काट देने वाले अत्याधिक दयालू एवं दया करने में कभी आलस्य ना करने वाले नित्यमुक्त प्रभु को नमस्कार है । अपने अंश से संपूर्ण जीवों के मन में अन्तर्यामी रूप से प्रकट रहने वाले सर्व नियन्ता अनन्त परमात्मा आप को नमस्कार है ॥१७॥

आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै-
र्दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय ।

मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय
ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥१८॥

शरीर, पुत्र, मित्र, घर, संपंत्ती एवं कुटुंबियों में आसक्त लोगों के द्वारा कठिनता से प्राप्त होने वाले तथा मुक्त पुरुषों के द्वारा अपने हृदय में निरन्तर चिन्तित ज्ञानस्वरूप , सर्वसमर्थ भगवान को नमस्कार है ॥१८॥

यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा
भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति ।

किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं
करोतु मेदभ्रदयो विमोक्षणम ॥१९॥

जिन्हे धर्म, अभिलाषित भोग, धन तथा मोक्ष की कामना से भजने वाले लोग अपनी मनचाही गति पा लेते हैं अपितु जो उन्हे अन्य प्रकार के अयाचित भोग एवं अविनाशी पार्षद शरीर भी देते हैं वे अतिशय दयालु प्रभु मुझे इस विपत्ती से सदा के लिये उबार लें ॥१९॥

एकान्तिनो यस्य न कंचनार्थ
वांछन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः ।

अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलं
गायन्त आनन्न्द समुद्रमग्नाः ॥२०॥

जिनके अनन्य भक्त -जो वस्तुतः एकमात्र उन भगवान के ही शरण है-धर्म , अर्थ आदि किसी भी पदार्थ को नही चाह्ते, अपितु उन्ही के परम मंगलमय एवं अत्यन्त विलक्षण चरित्रों का गान करते हुए आनन्द के समुद्र में गोते लगाते रहते हैं ॥२०॥

तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-
मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम ।

अतीन्द्रियं सूक्षममिवातिदूर-
मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥२१॥

उन अविनाशी, सर्वव्यापक, सर्वश्रेष्ठ, ब्रह्मादि के भी नियामक, अभक्तों के लिये प्रकट होने पर भी भक्तियोग द्वारा प्राप्त करने योग्य, अत्यन्त निकट होने पर भी माया के आवरण के कारण अत्यन्त दूर प्रतीत होने वाले , इन्द्रियों के द्वारा अगम्य तथा अत्यन्त दुर्विज्ञेय, अन्तरहित किंतु सबके आदिकारण एवं सब ओर से परिपूर्ण उन भगवान की मैं स्तुति करता हूँ ॥२१॥

यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः ।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥२२॥

ब्रह्मादि समस्त देवता, चारों वेद तथा संपूर्ण चराचर जीव नाम और आकृति भेद से जिनके अत्यन्त क्षुद्र अंश के द्वारा रचे गये हैं ॥२२॥

यथार्चिषोग्नेः सवितुर्गभस्तयो
निर्यान्ति संयान्त्यसकृत स्वरोचिषः ।

तथा यतोयं गुणसंप्रवाहो
बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥२३॥

जिस प्रकार प्रज्ज्वलित अग्नि से लपटें तथा सूर्य से किरणें बार बार निकलती है और पुनः अपने कारण मे लीन हो जाती है उसी प्रकार बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और नाना योनियों के शरीर – यह गुणमय प्रपंच जिन स्वयंप्रकाश परमात्मा से प्रकट होता है और पुनः उन्ही में लीन हो जात है ॥२३॥

स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यंग
न स्त्री न षण्डो न पुमान न जन्तुः ।

नायं गुणः कर्म न सन्न चासन
निषेधशेषो जयतादशेषः ॥२४॥

वे भगवान न तो देवता हैं न असुर, न मनुष्य हैं न तिर्यक (मनुष्य से नीची – पशु , पक्षी आदि किसी) योनि के प्राणी है । न वे स्त्री हैं न पुरुष और नपुंसक ही हैं । न वे ऐसे कोई जीव हैं, जिनका इन तीनों ही श्रेणियों में समावेश हो सके । न वे गुण हैं न कर्म, न कार्य हैं न तो कारण ही । सबका निषेध हो जाने पर जो कुछ बच रहता है, वही उनका स्वरूप है और वे ही सब कुछ है । ऐसे भगवान मेरे उद्धार के लिये आविर्भूत हों ॥२४॥

जिजीविषे नाहमिहामुया कि-
मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या ।

इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-
स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम ॥२५॥

मैं इस ग्राह के चंगुल से छूट कर जीवित नही रहना चाहता; क्योंकि भीतर और बाहर – सब ओर से अज्ञान से ढके हुए इस हाथी के शरीर से मुझे क्या लेना है । मैं तो आत्मा के प्रकाश को ढक देने वाले उस अज्ञान की निवृत्ति चाहता हूँ, जिसका कालक्रम से अपने आप नाश नही होता , अपितु भगवान की दया से अथवा ज्ञान के उदय से होता है ॥२५॥

सोsहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम ।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोस्मि परं पदम ॥२६॥

इस प्रकार मोक्ष का अभिलाषी मैं विश्व के रचियता, स्वयं विश्व के रूप में प्रकट तथा विश्व से सर्वथा परे, विश्व को खिलौना बनाकर खेलने वाले, विश्व में आत्मरूप से व्याप्त , अजन्मा, सर्वव्यापक एवं प्राप्त्य वस्तुओं में सर्वश्रेष्ठ श्री भगवान को केवल प्रणाम ही करता हूं, उनकी शरण में हूँ ॥२६॥

योगरन्धित कर्माणो हृदि योगविभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोsस्म्यहम ॥२७॥

जिन्होने भगवद्भक्ति रूप योग के द्वारा कर्मों को जला डाला है, वे योगी लोग उसी योग के द्वारा शुद्ध किये हुए अपने हृदय में जिन्हे प्रकट हुआ देखते हैं उन योगेश्वर भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ ॥२७॥

नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग-
शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय ।

प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये
कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥२८॥

जिनकी त्रिगुणात्मक (सत्त्व-रज-तमरूप ) शक्तियों का रागरूप वेग असह्य है, जो सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयरूप में प्रतीत हो रहे हैं, तथापि जिनकी इन्द्रियाँ विषयों में ही रची पची रहती हैं-ऐसे लोगों को जिनका मार्ग भी मिलना असंभव है, उन शरणागतरक्षक एवं अपारशक्तिशाली आपको बार बार नमस्कार है ॥२८॥

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छ्क्त्याहंधिया हतम ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोsस्म्यहम ॥२९॥

जिनकी अविद्या नामक शक्ति के कार्यरूप अहंकार से ढंके हुए अपने स्वरूप को यह जीव जान नही पाता, उन अपार महिमा वाले भगवान की मैं शरण आया हूँ ॥२९॥

श्री शुकदेव उवाच – श्री शुकदेवजी ने कहा –

एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं
ब्रह्मादयो विविधलिंगभिदाभिमानाः ।

नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात
तत्राखिलामर्मयो हरिराविरासीत ॥३०॥

जिसने पूर्वोक्त प्रकार से भगवान के भेदरहित निराकार स्वरूप का वर्णन किया था , उस गजराज के समीप जब ब्रह्मा आदि कोई भी देवता नही आये, जो भिन्न भिन्न प्रकार के विशिष्ट विग्रहों को ही अपना स्वरूप मानते हैं, तब सक्षात श्री हरि- जो सबके आत्मा होने के कारण सर्वदेवस्वरूप हैं-वहाँ प्रकट हो गये ॥३०॥

तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासः
स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भि : ।

छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान –
श्चक्रायुधोsभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥३१॥

उपर्युक्त गजराज को उस प्रकार दुःखी देख कर तथा उसके द्वारा पढी हुई स्तुति को सुन कर सुदर्शनचक्रधारी जगदाधार भगवान इच्छानुरूप वेग वाले गरुड जी की पीठ पर सवार होकर स्तवन करते हुए देवताओं के साथ तत्काल उस स्थान अपर पहुँच गये जहाँ वह हाथी था ।

सोsन्तस्सरस्युरुबलेन गृहीत आर्त्तो
दृष्ट्वा गरुत्मति हरि ख उपात्तचक्रम ।

उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छा –
न्नारायण्खिलगुरो भगवान नम्स्ते ॥३२॥

सरोवर के भीतर महाबली ग्राह के द्वारा पकडे जाकर दुःखी हुए उस हाथी ने आकाश में गरुड की पीठ पर सवार चक्र उठाये हुए भगवान श्री हरि को देखकर अपनी सूँड को -जिसमें उसने (पूजा के लिये) कमल का एक फूल ले रक्खा था-ऊपर उठाया और बडी ही कठिनाई से “सर्वपूज्य भगवान नारायण आपको प्रणाम है” यह वाक्य कहा ॥३२॥

तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य
सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार ।

ग्राहाद विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं
सम्पश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम ॥३३॥

उसे पीडित देख कर अजन्मा श्री हरि एकाएक गरुड को छोडकर नीचे झील पर उतर आये । वे दया से प्रेरित हो ग्राहसहित उस गजराज को तत्काल झील से बाहर निकाल लाये और देवताओं के देखते देखते चक्र से मुँह चीर कर उसके चंगुल से हाथी को उबार लिया ॥३३॥

 

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्रम् क्या है?

गजेन्द्र मोक्ष की कथा भागवत पुराण (स्कंध 8, अध्याय 3–4) में वर्णित है। यह कथा गजेन्द्र, हाथियों के राजा, की है जो एक मगरमच्छ (मकर) द्वारा पकड़ा जाता है और संकट के समय वह भगवान विष्णु को पूरी श्रद्धा से पुकारता है।

गजेन्द्र की इस पूर्ण शरणागति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर आते हैं और गजेन्द्र को बचाते हैं। यह कथा बताती है कि जब सब प्रयास विफल हो जाएं, तो ईश्वर में सच्चे हृदय से किया गया समर्पण ही मोक्ष का मार्ग बनता है।


गजेन्द्र मोक्ष की कथा का सार

तत्व विवरण
गजेन्द्र एक पूर्व जन्म का भक्त राजा जो श्रापवश हाथी बना
मगरमच्छ (मकर) कर्म बंधन और सांसारिक संघर्षों का प्रतीक
संघर्ष वर्षों तक चलने वाला जीवन संग्राम, मोह और पीड़ा का प्रतीक
ईश्वरीय कृपा भगवान विष्णु का प्रकट होकर उद्धार करना
मोक्ष गजेन्द्र का जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर दिव्य रूप में वापसी

‘मोक्ष’ का अर्थ इस स्तोत्र में

यह मोक्ष केवल शारीरिक मुक्ति नहीं, बल्कि अहंकार, पीड़ा, भय और कर्म बंधनों से मुक्ति का प्रतीक है। यह स्तोत्र आत्मा के परमात्मा से जुड़ने और पूर्ण समर्पण की भावना का मार्ग है।


2025 में गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र की प्रासंगिकता

🧘‍♂️ 1. मानसिक शांति और तनाव मुक्ति

व्यस्त जीवनशैली और चिंता भरे वातावरण में यह स्तोत्र एक आध्यात्मिक सहारा है।

🛡️ 2. संकटों और बाधाओं से रक्षा

नियमित पाठ से जीवन में आने वाले अप्रत्याशित संकटों और भय से रक्षा होती है।

🙏 3. समर्पण और विनम्रता का अभ्यास

यह सिखाता है कि अहंकार त्याग कर ईश्वर पर भरोसा करना ही सबसे बड़ा बल है।

🔁 4. नकारात्मक जीवन चक्रों से मुक्ति

यह स्तोत्र उन लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी है जो आत्मिक थकावट, विफलता या कष्टों के दोहराव से जूझ रहे हैं।


गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ कैसे करें?

तत्व अनुशंसा
समय प्रातः ब्रह्म मुहूर्त (4–6 बजे) या सूर्यास्त के बाद
दिन विशेष रूप से एकादशी, शनिवार, या व्यक्तिगत संकट के समय
आसन और दिशा पूर्व दिशा की ओर मुख करके शांत वातावरण में बैठें
आस्था श्रद्धा, विनम्रता और समर्पण भाव के साथ पाठ करें
स्रोत हिंदी/अंग्रेज़ी अर्थ सहित संस्कृत पाठ उपलब्ध है (ऐप्स या पुस्तकों में)

स्तोत्र की संरचना

  • 📖 कुल श्लोक: लगभग 28 श्लोक, भागवत पुराण से उद्धृत

  • 🙏 प्रारंभ: परमात्मा की महिमा का वर्णन

  • 🧎‍♂️ समाप्ति: आत्मा का पूर्ण समर्पण और मुक्ति की याचना


मुख्य भाव और शिक्षाएँ

भाव स्पष्टीकरण
शरणागति गजेन्द्र का पूर्ण समर्पण
अहंकार का अंत सांसारिक बल और शक्ति अस्थायी हैं
ईश्वरीय कृपा सच्ची भक्ति पर ईश्वर स्वयं प्रकट होकर उद्धार करते हैं
एकत्व का बोध भगवान विष्णु सर्वव्यापक और सर्वधर्मों से परे हैं
आस्था और विश्वास जब सभी प्रयास असफल हो जाएं, तब भी विश्वास न खोएं

आधुनिक युग में गजेन्द्र मोक्ष के लाभ

तनाव, भय और चिंता से मुक्ति

इसके नियमित जप से मन शांत होता है और श्वास और चित्त नियंत्रित रहते हैं।

ईश्वर में भरोसा और आत्मबल की वृद्धि

यह विपत्ति में धैर्य और आंतरिक शक्ति प्रदान करता है।

ध्यान और भक्ति में सहायक

प्रतिदिन के साधना क्रम, ध्यान और मानसिक अनुशासन के लिए उत्तम है।


प्रश्नोत्तर (FAQs)

Q1: क्या मैं संस्कृत न जानने पर भी इसका पाठ कर सकता हूँ?

हां। आप हिंदी या अंग्रेज़ी अनुवाद से पढ़ सकते हैं। भाव प्रधान है, भाषा नहीं।


Q2: क्या यह स्तोत्र केवल वृद्ध या धार्मिक लोगों के लिए है?

नहीं। यह स्तोत्र छात्रों, नौकरीपेशा, गृहिणियों और युवाओं सभी के लिए लाभकारी है।


Q3: क्या केवल सुनना भी उपयोगी है?

हाँ। एकाग्रता और श्रद्धा से श्रवण करने पर भी मानसिक और आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं।


Q4: कितनी बार इसका पाठ करना चाहिए?

दैनिक एक बार पर्याप्त है। विशेष साधना के लिए 11 या 21 बार या 48 दिन (मंडल) पाठ करें।


Q5: क्या यह पूर्व जन्म के कर्मों को भी शांत कर सकता है?

हां। यह स्तोत्र प्रारब्ध कर्मों से राहत दिलाने वाला माना जाता है।


निष्कर्ष

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र केवल एक कथा नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक जीवन दर्शन है। यह हमें सिखाता है कि जब अहंकार छोड़कर हम पूरी श्रद्धा से ईश्वर को पुकारते हैं, तो वह स्वयं हमें मुक्ति प्रदान करते हैं।

2025 की चुनौतियों और तनावों से घिरे युग में यह स्तोत्र आत्मा के लिए अमृत समान है—शांति, सुरक्षा और ईश्वरीय कृपा का द्वार।

हिंदी PDF/MP3 में गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र डाउनलोड करें

नीचे क्लिक करके आप मुफ्त में गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र को PDF/MP3 प्रारूप में डाउनलोड कर सकते हैं या प्रिंट भी कर सकते हैं।

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Vishnu Sahasranama Stotram
विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र
বিষ্ণু সহস্রনাম বাংলায়
વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ ગુજરાતીમાં
विष्णु मंत्र
Vishnu Mantra in English
आरती ओम जय जगदीश हरे
Om Jai Jagdish Hare Aarti In English

Gajendra Moksha Stotra

Gajendra Moksha Stotram is one of the most powerful hymns in Hindu scripture that exemplifies the essence of surrender (śaraṇāgati) and divine grace. As of 2025, this sacred stotra continues to be recited for mental peace, spiritual protection, and liberation from struggles—both external and internal.

This post is written for modern readers and spiritual seekers. It answers following queries:

  • What is Gajendra Moksha Stotram and why is it important?

  • What are the benefits of chanting Gajendra Moksha daily?

  • How is it connected to Lord Vishnu and moksha (liberation)?

Gajendra Moksha Stotra in Hindi/Sanskrit Lyrics

ओं नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ||

यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम
योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम ||

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं क्वचिद्विभातं क्व च तत्तिरोहितम
अविद्धदृक्साक्ष्युभयं तदीक्षते स आत्ममूलोऽवतु मां परात्परः ||

कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्नशो लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु
तमस्तदासीद्गहनं गभीरं यस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः ||

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदुर्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ||

दिदृक्षवो यस्य पदं सुमङ्गलं विमुक्तसङ्गा मुनयः सुसाधवः
चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने भूतात्मभूताः सुहृदः स मे गतिः ||

न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा न नामरूपे गुणदोष एव वा
तथापि लोकाप्ययसम्भवाय यः स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ||

तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्यकर्मणे ||

नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ||

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता
नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ||

नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ||

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे
पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ||

सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे
असता च्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ||

नमो नमस्तेऽखिलकारणाय निष्कारणायाद्भुतकारणाय
सर्वागमाम्नायमहार्णवाय नमोऽपवर्गाय परायणाय ||

गुणारणिच्छन्नचिदुष्मपाय तत्क्षोभविस्फूर्जितमानसाय
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ||

मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय
स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ||

आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तैर्दुष्प्रापणाय गुणसङ्गविवर्जिताय
मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ||

यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति
किं चाशिषो रात्यपि देहमव्ययं करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम ||

एकान्तिनो यस्य न कञ्चनार्थं वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमङ्गलं गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः ||

तमक्षरं ब्रह्म परं परेशमव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूरमनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ||

यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ||

यथार्चिषोऽग्नेः सवितुर्गभस्तयो निर्यान्ति संयान्त्यसकृत्स्वरोचिषः
तथा यतोऽयं गुणसम्प्रवाहो बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ||

स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ्न स्त्री न षण्ढो न पुमान्न जन्तुः
नायं गुणः कर्म न सन्न चासन्निषेधशेषो जयतादशेषः ||

जिजीविषे नाहमिहामुया किमन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लवस्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम ||

सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम ||

योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम ||

नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय
प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ||

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहंधिया हतम
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम ||

What is Gajendra Moksha Stotram?

Gajendra Moksha is a powerful devotional hymn found in the Bhagavata Purana (Canto 8, Chapter 3–4). It narrates the story of Gajendra, the king of elephants, who is caught by a crocodile in a lake and calls upon Lord Vishnu for rescue with deep surrender and devotion.

Lord Vishnu, moved by Gajendra’s sincere prayer, descends on Garuda and liberates him—symbolizing the triumph of faith and divine intervention in moments of distress.

The stotra is the exact prayer sung by Gajendra, and its recitation is believed to bring relief from suffering, karmic bondage, fear, and spiritual obstacles.


Story Summary of Gajendra Moksha

Element Description
Gajendra A divine elephant king, deeply devoted to Vishnu, cursed into animal form
Crocodile (Makara) Symbol of karmic bondage and worldly entanglement
Struggle Lifelong fight in the lake, representing duality and suffering
Divine Rescue Lord Vishnu appears and saves Gajendra upon his full surrender
Moksha Gajendra attains liberation (moksha) and regains his original divine form

Meaning of “Moksha” in Gajendra Moksha

In this context, moksha doesn’t just mean physical rescue—it refers to freedom from ego, attachment, and repeated suffering (samsara). The stotra is thus symbolic of soul’s surrender to the Supreme.


Why is Gajendra Moksha Relevant?

🌍 1. For Mental Health & Stress Relief

In today’s high-stress world, the stotra provides a mental anchor through chanting and devotion.

🛡️ 2. For Protection from Adversities

Chanted regularly, it’s believed to protect the devotee from unforeseen dangers and karmic challenges.

🧘‍♀️ 3. For Surrender & Letting Go

Teaches the art of surrendering the ego and trusting divine timing—a universal spiritual lesson.

🔄 4. For Breaking Repeating Life Patterns

Helps transcend toxic loops of fear, failure, and self-doubt—bringing peace and progress.


How to Recite Gajendra Moksha Stotram (2025 Guidelines)

Aspect Recommendation
Time Early morning (Brahma Muhurta) or sunset
Days Ideal on Ekadashi, Saturdays, or during personal difficulty
Posture Sit in a calm space facing east, light a lamp or diya
Intent Recite with devotion, humility, and surrender
Resources Use a transliterated version with meaning (available in Sanskrit + local language)

Stotra Structure

  • 📖 28 Verses (Shlokas) from Bhagavatam (Skanda 8)

  • 🙏 Begins with invocation to Supreme Being (Narayana)

  • 💫 Ends with complete self-surrender and request for liberation


Core Themes of the Stotram

Theme Explanation
Surrender (Sharanagati) Gajendra calls upon the Lord with complete faith
Impermanence Realizes worldly power, strength, and pride are temporary
Divine Grace Liberation is possible only through divine will and devotion
Unity in Diversity Vishnu as the supreme being, beyond names, forms, and sects
Faith in Crisis When all else fails, sincere faith is the only raft across suffering

Modern-Day Benefits of Gajendra Moksha Stotram

Reduces Anxiety and Fear

The repetitive chanting helps regulate breath, calm the mind, and reduce cortisol levels.

Inspires Trust in the Divine

Helps those facing financial, emotional, or health crises find inner strength and guidance.

Improves Focus and Devotion

Ideal for daily spiritual routine, meditation practice, or starting the day mindfully.


FAQs: Gajendra Moksha Stotram

Q1: Can I recite Gajendra Moksha even if I don’t know Sanskrit?

Yes. English/Hindi transliterations are widely available. Devotion matters more than perfect pronunciation.


Q2: Is this stotra only for elderly or spiritual people?

No. It is ideal for students, professionals, homemakers, and youth alike—especially during tough times.


Q3: Can I just listen to it instead of chanting?

Yes. Listening with awareness and faith also brings emotional and spiritual benefits.


Q4: How many times should I recite it?

Once a day is beneficial. During intense times, devotees chant it 11 or 21 times or daily for 48 days (mandala parayana).


Q5: Does it help with past karma?

Yes. The stotra is said to help neutralize prarabdha karma (ripened past actions) through sincere prayer.


Conclusion

Gajendra Moksha Stotram is not just a story or scripture—it’s a blueprint for spiritual liberation. It teaches that no being is too small, and no situation is too hopeless when there is complete faith and surrender to the Divine.

In 2025, as challenges become more psychological and spiritual, this ancient hymn offers a timeless antidote: devotion, humility, and surrender.

Let Gajendra’s cry become your inner mantra—and experience freedom, peace, and divine connection in daily life.

Gajendra Moksha Stotra in Tamil/Telgu/Gujrati/Marathi/English

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विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र – आध्यात्मिक शांति का स्रोत

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र हिन्दू धर्म में एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली पाठ माना जाता है, जिसमें भगवान विष्णु के हजार नामों का वर्णन होता है। यह स्तोत्र न केवल भक्तों को भगवान विष्णु की दिव्य शक्तियों से जोड़ता है, बल्कि उन्हें जीवन की समस्याओं से मुक्ति दिलाने में भी सहायक है। आइये जानते हैं इसके पाठ की विधि, लाभ और महत्व के बारे में।

विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र हिंदी में अनुवाद सहित

हरिः ॐ

विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ 1 ॥

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमागतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञो‌உक्षर एव च ॥ 2 ॥

योगो योगविदां नेता प्रधान पुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ 3 ॥

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ 4 ॥

स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ 5 ॥

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभो‌உमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ 6 ॥

अग्राह्यः शाश्वतो कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ 7 ॥

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ 8 ॥

ईश्वरो विक्रमीधन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान्॥ 9 ॥

सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहस्संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ 10 ॥

अजस्सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिस्सृतः ॥ 11 ॥

वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मा सम्मितस्समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ 12 ॥

रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।
अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥ 13 ॥

सर्वगः सर्व विद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित्कविः ॥ 14 ॥

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ 15 ॥

भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्नुर्जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ 16 ॥

उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः ।
अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ 17 ॥

वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ 18 ॥

महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ 19 ॥

महेश्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सताङ्गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ 20 ॥

मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ 21 ॥

अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ 22 ॥

गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषो‌உनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ 23 ॥

अग्रणीग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ 24 ॥

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ 25 ॥

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ 26 ॥

असङ्ख्येयो‌உप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धि साधनः ॥ 27 ॥

वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ 28 ॥

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ 29 ॥

ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्दः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ 30 ॥

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ 31 ॥

भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनो‌உनलः ।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ 32 ॥

युगादि कृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ 33 ॥

इष्टो‌உविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ 34 ॥

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ 35 ॥

स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्धरः ॥ 36 ॥

अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ 37 ॥

पद्मनाभो‌உरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् ।
महर्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥ 38 ॥

अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः ॥ 39 ॥

विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ 40 ॥

उद्भवः, क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ 41 ॥

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः ।
परर्धिः परमस्पष्टः तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ 42 ॥

रामो विरामो विरजो मार्गोनेयो नयो‌உनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मोधर्म विदुत्तमः ॥ 43 ॥

वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ 44 ॥

ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ 45 ॥

विस्तारः स्थावर स्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् ।
अर्थो‌உनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ 46 ॥

अनिर्विण्णः स्थविष्ठो भूद्धर्मयूपो महामखः ।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः, क्षामः समीहनः ॥ 47 ॥

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सताङ्गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ 48 ॥

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।
मनोहरो जितक्रोधो वीर बाहुर्विदारणः ॥ 49 ॥

स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत्। ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ 50 ॥

धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम्॥
अविज्ञाता सहस्त्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ 51 ॥

गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूत महेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ 52 ॥

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीर भूतभृद् भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ 53 ॥

सोमपो‌உमृतपः सोमः पुरुजित् पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वतां पतिः ॥ 54 ॥

जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दो‌உमित विक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधि शयोन्तकः ॥ 55 ॥

अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो‌உनन्दनोनन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ 56 ॥

महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ 57 ॥

महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्र गदाधरः ॥ 58 ॥

वेधाः स्वाङ्गो‌உजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणो‌உच्युतः ।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ 59 ॥

भगवान् भगहा‌உ‌உनन्दी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ 60 ॥

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिवःस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥ 61 ॥

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् ।
सन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम्। 62 ॥

शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ 63 ॥

अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः ॥ 64 ॥

श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमांल्लोकत्रयाश्रयः ॥ 65 ॥

स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः ।
विजितात्मा‌உविधेयात्मा सत्कीर्तिच्छिन्नसंशयः ॥ 66 ॥

उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥ 67 ॥

अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धो‌உप्रतिरथः प्रद्युम्नो‌உमितविक्रमः ॥ 68 ॥

कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥ 69 ॥

कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरो‌உनन्तो धनञ्जयः ॥ 70 ॥

ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥ 71 ॥

महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ 72 ॥

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ 73 ॥

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ 74 ॥

सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥ 75 ॥

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयो‌உनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरो‌உथापराजितः ॥ 76 ॥

विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥ 77 ॥

एको नैकः सवः कः किं यत्तत् पदमनुत्तमम् ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ 78 ॥

सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ 79 ॥

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ 80 ॥

तेजो‌உवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतांवरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ॥ 81 ॥

चतुर्मूर्ति श्चतुर्बाहु श्चतुर्व्यूह श्चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ 82 ॥

समावर्तो‌உनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥ 83 ॥

शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ 84 ॥

उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ 85 ॥

सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाहृदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ 86 ॥

कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनो‌உनिलः ।
अमृताशो‌உमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥ 87 ॥

सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
न्यग्रोधो‌உदुम्बरो‌உश्वत्थश्चाणूरान्ध्र निषूदनः ॥ 88 ॥

सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघो‌உचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥ 89 ॥

अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥ 90 ॥

भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः, क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ 91 ॥

धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ता‌உनियमो‌உयमः ॥ 92 ॥

सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्हो‌உर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ॥ 93 ॥

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ 94 ॥

अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजो‌உग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकधिष्ठानमद्भुतः ॥ 95 ॥

सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्तिः स्वस्तिभुक् स्वस्तिदक्षिणः ॥ 96 ॥

अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ 97 ॥

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः, क्षमिणांवरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ 98 ॥

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ 99 ॥

अनन्तरूपो‌உनन्त श्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।
चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ 100 ॥

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ 101 ॥

आधारनिलयो‌உधाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ 102 ॥

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत् प्राणजीवनः ।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ 103 ॥

भूर्भुवः स्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ 104 ॥

यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुक् यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ 105 ॥

आत्मयोनिः स्वयञ्जातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ 106 ॥

शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ 107 ॥

श्री सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ।

वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी ।
श्रीमान्नारायणो विष्णुर्वासुदेवो‌உभिरक्षतु ॥ 108 ॥

श्री वासुदेवो‌உभिरक्षतु ॐ नम इति ।

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का महत्व

भगवान विष्णु को संसार का पालनहार माना जाता है और उनके सहस्रनाम का पाठ करने से भक्तों को आध्यात्मिक शक्ति और मानसिक शांति प्राप्त होती है। यह स्तोत्र न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि यह व्यक्ति को नैतिक और भौतिक उन्नति की ओर भी ले जाता है।

विष्णु सहस्रनाम का पाठ कैसे करें?

तैयारी: स्नान करके साफ कपड़े पहनें और पूजा के स्थान को साफ करें।
पूजा स्थल की सजावट: विष्णु जी की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक जलाएं और पुष्प अर्पित करें।
मंत्र जाप: ‘विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र’ का पाठ शांत और ध्यानपूर्वक करें। प्रत्येक नाम का उच्चारण स्पष्ट रूप से करें।
ध्यान: पाठ के बाद कुछ समय ध्यान में बैठें और भगवान विष्णु के दिव्य गुणों का चिंतन करें।

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र के लाभ

मानसिक शांति: नियमित पाठ से मानसिक तनाव और चिंता में कमी आती है।
आध्यात्मिक उन्नति: इसके पाठ से आत्मिक शक्ति बढ़ती है और व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से उन्नत होता है।
सुरक्षा और संरक्षण: मान्यता है कि विष्णु सहस्रनाम के पाठ से जीवन की विभिन्न बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा मिलती है।
भौतिक लाभ: इसके पाठ से न केवल आध्यात्मिक बल्कि भौतिक लाभ भी होता है।

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ न केवल आपके दैनिक जीवन में शांति लाता है बल्कि यह आपको भगवान विष्णु के निकट लाने में भी सहायक होता है। इस पवित्र पाठ को अपने जीवन में शामिल करके आप अद्भुत आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

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ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਸਹਸ੍ਰਨਾਮ ਸ੍ਤੋਤ੍ਰ | Vishnu Sahasranamam in Punjabi

ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਸਹਸ੍ਰਨਾਮ ਸਟੋਤਰ ਨੂੰ ਹਿੰਦੂ ਧਰਮ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਬਹੁਤ ਹੀ ਪਵਿੱਤਰ ਅਤੇ ਸ਼ਕਤੀਸ਼ਾਲੀ ਪਾਠ ਮੰਨਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਜੋ ਭਗਵਾਨ ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਦੇ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਨਾਵਾਂ ਦਾ ਵਰਣਨ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਇਹ ਸਟੋਤਰ ਨਾ ਸਿਰਫ਼ ਸ਼ਰਧਾਲੂਆਂ ਨੂੰ ਰੱਬ ਦੀਆਂ ਬ੍ਰਹਮ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਨਾਲ ਜੋੜਦਾ ਹੈ ਬਲਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਜੀਵਨ ਦੀਆਂ ਸਮੱਸਿਆਵਾਂ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਵੀ ਮਦਦ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਆਓ ਜਾਣਦੇ ਹਾਂ ਇਸ ਦੀ ਵਿਧੀ, ਫਾਇਦੇ ਅਤੇ ਮਹੱਤਵ ਬਾਰੇ।

Vishnu Sahasranamam Punjabi lyrics

ਸ੍ਤੋਤ੍ਰਮ੍ ।
ਹਰਿਃ ੴ ।
ਵਿਸ਼੍ਵੰ ਵਿਸ਼਼੍ਣੁਰ੍ਵਸ਼਼ਟ੍ਕਾਰੋ ਭੂਤਭਵ੍ਯਭਵਤ੍ਪ੍ਰਭੁਃ ।
ਭੂਤਕ੍ਰੁਦ੍ਭੂਤਭ੍ਰੁਦ੍ਭਾਵੋ ਭੂਤਾਤ੍ਮਾ ਭੂਤਭਾਵਨਃ ॥ 1॥

ਪੂਤਾਤ੍ਮਾ ਪਰਮਾਤ੍ਮਾ ਚ ਮੁਕ੍ਤਾਨਾਂ ਪਰਮਾ ਗਤਿਃ ।
ਅਵ੍ਯਯਃ ਪੁਰੁਸ਼਼ਃ ਸਾਕ੍ਸ਼਼ੀ ਕ੍ਸ਼਼ੇਤ੍ਰਜ੍ਞੋ(ਅ)ਕ੍ਸ਼਼ਰ ਏਵ ਚ ॥ 2॥

ਯੋਗੋ ਯੋਗਵਿਦਾਂ ਨੇਤਾ ਪ੍ਰਧਾਨਪੁਰੁਸ਼਼ੇਸ਼੍ਵਰਃ ।
ਨਾਰਸਿੰਹਵਪੁਃ ਸ਼੍ਰੀਮਾਨ੍ ਕੇਸ਼ਵਃ ਪੁਰੁਸ਼਼ੋੱਤਮਃ ॥ 3॥

ਸਰ੍ਵਃ ਸ਼ਰ੍ਵਃ ਸ਼ਿਵਃ ਸ੍ਥਾਣੁਰ੍ਭੂਤਾਦਿਰ੍ਨਿਧਿਰਵ੍ਯਯਃ ।
ਸਮ੍ਭਵੋ ਭਾਵਨੋ ਭਰ੍ਤਾ ਪ੍ਰਭਵਃ ਪ੍ਰਭੁਰੀਸ਼੍ਵਰਃ ॥ 4॥

ਸ੍ਵਯਮ੍ਭੂਃ ਸ਼ਮ੍ਭੁਰਾਦਿਤ੍ਯਃ ਪੁਸ਼਼੍ਕਰਾਕ੍ਸ਼਼ੋ ਮਹਾਸ੍ਵਨਃ ।
ਅਨਾਦਿਨਿਧਨੋ ਧਾਤਾ ਵਿਧਾਤਾ ਧਾਤੁਰੁੱਤਮਃ ॥ 5॥

ਅਪ੍ਰਮੇਯੋ ਹ੍ਰੁਸ਼਼ੀਕੇਸ਼ਃ ਪਦ੍ਮਨਾਭੋ(ਅ)ਮਰਪ੍ਰਭੁਃ ।
ਵਿਸ਼੍ਵਕਰ੍ਮਾ ਮਨੁਸ੍ਤ੍ਵਸ਼਼੍ਟਾ ਸ੍ਥਵਿਸ਼਼੍ਠਃ ਸ੍ਥਵਿਰੋ ਧ੍ਰੁਵਃ ॥ 6॥

ਅਗ੍ਰਾਹ੍ਯਃ ਸ਼ਾਸ਼੍ਵਤਃ ਕ੍ਰੁਸ਼਼੍ਣੋ ਲੋਹਿਤਾਕ੍ਸ਼਼ਃ ਪ੍ਰਤਰ੍ਦਨਃ ।
ਪ੍ਰਭੂਤਸ੍ਤ੍ਰਿਕਕੁਬ੍ਧਾਮ ਪਵਿਤ੍ਰੰ ਮਙ੍ਗਲੰ ਪਰਮ੍ ॥ 7॥

ਈਸ਼ਾਨਃ ਪ੍ਰਾਣਦਃ ਪ੍ਰਾਣੋ ਜ੍ਯੇਸ਼਼੍ਠਃ ਸ਼੍ਰੇਸ਼਼੍ਠਃ ਪ੍ਰਜਾਪਤਿਃ ।
ਹਿਰਣ੍ਯਗਰ੍ਭੋ ਭੂਗਰ੍ਭੋ ਮਾਧਵੋ ਮਧੁਸੂਦਨਃ ॥ 8॥

ਈਸ਼੍ਵਰੋ ਵਿਕ੍ਰਮੀ ਧਨ੍ਵੀ ਮੇਧਾਵੀ ਵਿਕ੍ਰਮਃ ਕ੍ਰਮਃ ।
ਅਨੁੱਤਮੋ ਦੁਰਾਧਰ੍ਸ਼਼ਃ ਕ੍ਰੁਤਜ੍ਞਃ ਕ੍ਰੁਤਿਰਾਤ੍ਮਵਾਨ੍ ॥ 9॥

ਸੁਰੇਸ਼ਃ ਸ਼ਰਣੰ ਸ਼ਰ੍ਮ ਵਿਸ਼੍ਵਰੇਤਾਃ ਪ੍ਰਜਾਭਵਃ ।
ਅਹਃ ਸੰਵਤ੍ਸਰੋ ਵ੍ਯਾਲਃ ਪ੍ਰਤ੍ਯਯਃ ਸਰ੍ਵਦਰ੍ਸ਼ਨਃ ॥ 10॥

ਅਜਃ ਸਰ੍ਵੇਸ਼੍ਵਰਃ ਸਿੱਧਃ ਸਿੱਧਿਃ ਸਰ੍ਵਾਦਿਰਚ੍ਯੁਤਃ ।
ਵ੍ਰੁਸ਼਼ਾਕਪਿਰਮੇਯਾਤ੍ਮਾ ਸਰ੍ਵਯੋਗਵਿਨਿਃਸ੍ਰੁਤਃ ॥ 11॥

ਵਸੁਰ੍ਵਸੁਮਨਾਃ ਸਤ੍ਯਃ ਸਮਾਤ੍ਮਾ(ਅ)ਸੰਮਿਤਃ ਸਮਃ ।
ਅਮੋਘਃ ਪੁਣ੍ਡਰੀਕਾਕ੍ਸ਼਼ੋ ਵ੍ਰੁਸ਼਼ਕਰ੍ਮਾ ਵ੍ਰੁਸ਼਼ਾਕ੍ਰੁਤਿਃ ॥ 12॥

ਰੁਦ੍ਰੋ ਬਹੁਸ਼ਿਰਾ ਬਭ੍ਰੁਰ੍ਵਿਸ਼੍ਵਯੋਨਿਃ ਸ਼ੁਚਿਸ਼੍ਰਵਾਃ ।
ਅਮ੍ਰੁਤਃ ਸ਼ਾਸ਼੍ਵਤਸ੍ਥਾਣੁਰ੍ਵਰਾਰੋਹੋ ਮਹਾਤਪਾਃ ॥ 13॥

ਸਰ੍ਵਗਃ ਸਰ੍ਵਵਿਦ੍ਭਾਨੁਰ੍ਵਿਸ਼਼੍ਵਕ੍ਸੇਨੋ ਜਨਾਰ੍ਦਨਃ ।
ਵੇਦੋ ਵੇਦਵਿਦਵ੍ਯਙ੍ਗੋ ਵੇਦਾਙ੍ਗੋ ਵੇਦਵਿਤ੍ ਕਵਿਃ ॥ 14॥

ਲੋਕਾਧ੍ਯਕ੍ਸ਼਼ਃ ਸੁਰਾਧ੍ਯਕ੍ਸ਼਼ੋ ਧਰ੍ਮਾਧ੍ਯਕ੍ਸ਼਼ਃ ਕ੍ਰੁਤਾਕ੍ਰੁਤਃ ।
ਚਤੁਰਾਤ੍ਮਾ ਚਤੁਰ੍ਵ੍ਯੂਹਸ਼੍ਚਤੁਰ੍ਦੰਸ਼਼੍ਟ੍ਰਸ਼੍ਚਤੁਰ੍ਭੁਜਃ ॥ 15॥

ਭ੍ਰਾਜਿਸ਼਼੍ਣੁਰ੍ਭੋਜਨੰ ਭੋਕ੍ਤਾ ਸਹਿਸ਼਼੍ਣੁਰ੍ਜਗਦਾਦਿਜਃ ।
ਅਨਘੋ ਵਿਜਯੋ ਜੇਤਾ ਵਿਸ਼੍ਵਯੋਨਿਃ ਪੁਨਰ੍ਵਸੁਃ ॥ 16॥

ਉਪੇਨ੍ਦ੍ਰੋ ਵਾਮਨਃ ਪ੍ਰਾਂਸ਼ੁਰਮੋਘਃ ਸ਼ੁਚਿਰੂਰ੍ਜਿਤਃ ।
ਅਤੀਨ੍ਦ੍ਰਃ ਸਙ੍ਗ੍ਰਹਃ ਸਰ੍ਗੋ ਧ੍ਰੁਤਾਤ੍ਮਾ ਨਿਯਮੋ ਯਮਃ ॥ 17॥

ਵੇਦ੍ਯੋ ਵੈਦ੍ਯਃ ਸਦਾਯੋਗੀ ਵੀਰਹਾ ਮਾਧਵੋ ਮਧੁਃ ।
ਅਤੀਨ੍ਦ੍ਰਿਯੋ ਮਹਾਮਾਯੋ ਮਹੋਤ੍ਸਾਹੋ ਮਹਾਬਲਃ ॥ 18॥

ਮਹਾਬੁੱਧਿਰ੍ਮਹਾਵੀਰ੍ਯੋ ਮਹਾਸ਼ਕ੍ਤਿਰ੍ਮਹਾਦ੍ਯੁਤਿਃ ।
ਅਨਿਰ੍ਦੇਸ਼੍ਯਵਪੁਃ ਸ਼੍ਰੀਮਾਨਮੇਯਾਤ੍ਮਾ ਮਹਾਦ੍ਰਿਧ੍ਰੁਕ੍ ॥ 19॥

ਮਹੇਸ਼਼੍ਵਾਸੋ ਮਹੀਭਰ੍ਤਾ ਸ਼੍ਰੀਨਿਵਾਸਃ ਸਤਾਂ ਗਤਿਃ ।
ਅਨਿਰੁੱਧਃ ਸੁਰਾਨਨ੍ਦੋ ਗੋਵਿਨ੍ਦੋ ਗੋਵਿਦਾਂ ਪਤਿਃ ॥ 20॥

ਮਰੀਚਿਰ੍ਦਮਨੋ ਹੰਸਃ ਸੁਪਰ੍ਣੋ ਭੁਜਗੋੱਤਮਃ ।
ਹਿਰਣ੍ਯਨਾਭਃ ਸੁਤਪਾਃ ਪਦ੍ਮਨਾਭਃ ਪ੍ਰਜਾਪਤਿਃ ॥ 21॥

ਅਮ੍ਰੁਤ੍ਯੁਃ ਸਰ੍ਵਦ੍ਰੁਕ੍ ਸਿੰਹਃ ਸਨ੍ਧਾਤਾ ਸਨ੍ਧਿਮਾਨ੍ ਸ੍ਥਿਰਃ ।
ਅਜੋ ਦੁਰ੍ਮਰ੍ਸ਼਼ਣਃ ਸ਼ਾਸ੍ਤਾ ਵਿਸ਼੍ਰੁਤਾਤ੍ਮਾ ਸੁਰਾਰਿਹਾ ॥ 22॥

ਗੁਰੁਰ੍ਗੁਰੁਤਮੋ ਧਾਮ ਸਤ੍ਯਃ ਸਤ੍ਯਪਰਾਕ੍ਰਮਃ ।
ਨਿਮਿਸ਼਼ੋ(ਅ)ਨਿਮਿਸ਼਼ਃ ਸ੍ਰਗ੍ਵੀ ਵਾਚਸ੍ਪਤਿਰੁਦਾਰਧੀਃ ॥ 23॥

ਅਗ੍ਰਣੀਰ੍ਗ੍ਰਾਮਣੀਃ ਸ਼੍ਰੀਮਾਨ੍ ਨ੍ਯਾਯੋ ਨੇਤਾ ਸਮੀਰਣਃ ।
ਸਹਸ੍ਰਮੂਰ੍ਧਾ ਵਿਸ਼੍ਵਾਤ੍ਮਾ ਸਹਸ੍ਰਾਕ੍ਸ਼਼ਃ ਸਹਸ੍ਰਪਾਤ੍ ॥ 24॥

ਆਵਰ੍ਤਨੋ ਨਿਵ੍ਰੁੱਤਾਤ੍ਮਾ ਸੰਵ੍ਰੁਤਃ ਸਮ੍ਪ੍ਰਮਰ੍ਦਨਃ ।
ਅਹਃ ਸੰਵਰ੍ਤਕੋ ਵਹ੍ਨਿਰਨਿਲੋ ਧਰਣੀਧਰਃ ॥ 25॥

ਸੁਪ੍ਰਸਾਦਃ ਪ੍ਰਸੰਨਾਤ੍ਮਾ ਵਿਸ਼੍ਵਧ੍ਰੁਗ੍ਵਿਸ਼੍ਵਭੁਗ੍ਵਿਭੁਃ ।
ਸਤ੍ਕਰ੍ਤਾ ਸਤ੍ਕ੍ਰੁਤਃ ਸਾਧੁਰ੍ਜਹ੍ਨੁਰ੍ਨਾਰਾਯਣੋ ਨਰਃ ॥ 26॥

ਅਸਙ੍ਖ੍ਯੇਯੋ(ਅ)ਪ੍ਰਮੇਯਾਤ੍ਮਾ ਵਿਸ਼ਿਸ਼਼੍ਟਃ ਸ਼ਿਸ਼਼੍ਟਕ੍ਰੁੱਛੁਚਿਃ ।
ਸਿੱਧਾਰ੍ਥਃ ਸਿੱਧਸਙ੍ਕਲ੍ਪਃ ਸਿੱਧਿਦਃ ਸਿੱਧਿਸਾਧਨਃ ॥ 27॥

ਵ੍ਰੁਸ਼਼ਾਹੀ ਵ੍ਰੁਸ਼਼ਭੋ ਵਿਸ਼਼੍ਣੁਰ੍ਵ੍ਰੁਸ਼਼ਪਰ੍ਵਾ ਵ੍ਰੁਸ਼਼ੋਦਰਃ ।
ਵਰ੍ਧਨੋ ਵਰ੍ਧਮਾਨਸ਼੍ਚ ਵਿਵਿਕ੍ਤਃ ਸ਼੍ਰੁਤਿਸਾਗਰਃ ॥ 28॥

ਸੁਭੁਜੋ ਦੁਰ੍ਧਰੋ ਵਾਗ੍ਮੀ ਮਹੇਨ੍ਦ੍ਰੋ ਵਸੁਦੋ ਵਸੁਃ ।
ਨੈਕਰੂਪੋ ਬ੍ਰੁਹਦ੍ਰੂਪਃ ਸ਼ਿਪਿਵਿਸ਼਼੍ਟਃ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਨਃ ॥ 29॥

ਓਜਸ੍ਤੇਜੋਦ੍ਯੁਤਿਧਰਃ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਾਤ੍ਮਾ ਪ੍ਰਤਾਪਨਃ ।
ਰੁੱਧਃ ਸ੍ਪਸ਼਼੍ਟਾਕ੍ਸ਼਼ਰੋ ਮਨ੍ਤ੍ਰਸ਼੍ਚਨ੍ਦ੍ਰਾਂਸ਼ੁਰ੍ਭਾਸ੍ਕਰਦ੍ਯੁਤਿਃ ॥ 30॥

ਅਮ੍ਰੁਤਾਂਸ਼ੂਦ੍ਭਵੋ ਭਾਨੁਃ ਸ਼ਸ਼ਬਿਨ੍ਦੁਃ ਸੁਰੇਸ਼੍ਵਰਃ ।
ਔਸ਼਼ਧੰ ਜਗਤਃ ਸੇਤੁਃ ਸਤ੍ਯਧਰ੍ਮਪਰਾਕ੍ਰਮਃ ॥ 31॥

ਭੂਤਭਵ੍ਯਭਵੰਨਾਥਃ ਪਵਨਃ ਪਾਵਨੋ(ਅ)ਨਲਃ ।
ਕਾਮਹਾ ਕਾਮਕ੍ਰੁਤ੍ਕਾਨ੍ਤਃ ਕਾਮਃ ਕਾਮਪ੍ਰਦਃ ਪ੍ਰਭੁਃ ॥ 32॥

ਯੁਗਾਦਿਕ੍ਰੁਦ੍ਯੁਗਾਵਰ੍ਤੋ ਨੈਕਮਾਯੋ ਮਹਾਸ਼ਨਃ ।
ਅਦ੍ਰੁਸ਼੍ਯੋ ਵ੍ਯਕ੍ਤਰੂਪਸ਼੍ਚ ਸਹਸ੍ਰਜਿਦਨਨ੍ਤਜਿਤ੍ ॥ 33॥

ਇਸ਼਼੍ਟੋ(ਅ)ਵਿਸ਼ਿਸ਼਼੍ਟਃ ਸ਼ਿਸ਼਼੍ਟੇਸ਼਼੍ਟਃ ਸ਼ਿਖਣ੍ਡੀ ਨਹੁਸ਼਼ੋ ਵ੍ਰੁਸ਼਼ਃ ।
ਕ੍ਰੋਧਹਾ ਕ੍ਰੋਧਕ੍ਰੁਤ੍ਕਰ੍ਤਾ ਵਿਸ਼੍ਵਬਾਹੁਰ੍ਮਹੀਧਰਃ ॥ 34॥

ਅਚ੍ਯੁਤਃ ਪ੍ਰਥਿਤਃ ਪ੍ਰਾਣਃ ਪ੍ਰਾਣਦੋ ਵਾਸਵਾਨੁਜਃ ।
ਅਪਾਂਨਿਧਿਰਧਿਸ਼਼੍ਠਾਨਮਪ੍ਰਮੱਤਃ ਪ੍ਰਤਿਸ਼਼੍ਠਿਤਃ ॥ 35॥

ਸ੍ਕਨ੍ਦਃ ਸ੍ਕਨ੍ਦਧਰੋ ਧੁਰ੍ਯੋ ਵਰਦੋ ਵਾਯੁਵਾਹਨਃ ।
ਵਾਸੁਦੇਵੋ ਬ੍ਰੁਹਦ੍ਭਾਨੁਰਾਦਿਦੇਵਃ ਪੁਰਨ੍ਦਰਃ ॥ 36॥

ਅਸ਼ੋਕਸ੍ਤਾਰਣਸ੍ਤਾਰਃ ਸ਼ੂਰਃ ਸ਼ੌਰਿਰ੍ਜਨੇਸ਼੍ਵਰਃ ।
ਅਨੁਕੂਲਃ ਸ਼ਤਾਵਰ੍ਤਃ ਪਦ੍ਮੀ ਪਦ੍ਮਨਿਭੇਕ੍ਸ਼਼ਣਃ ॥ 37॥

ਪਦ੍ਮਨਾਭੋ(ਅ)ਰਵਿਨ੍ਦਾਕ੍ਸ਼਼ਃ ਪਦ੍ਮਗਰ੍ਭਃ ਸ਼ਰੀਰਭ੍ਰੁਤ੍ ।
ਮਹਰ੍ੱਧਿੱਰੁੱਧੋ ਵ੍ਰੁੱਧਾਤ੍ਮਾ ਮਹਾਕ੍ਸ਼਼ੋ ਗਰੁਡਧ੍ਵਜਃ ॥ 38॥

ਅਤੁਲਃ ਸ਼ਰਭੋ ਭੀਮਃ ਸਮਯਜ੍ਞੋ ਹਵਿਰ੍ਹਰਿਃ ।
ਸਰ੍ਵਲਕ੍ਸ਼਼ਣਲਕ੍ਸ਼਼ਣ੍ਯੋ ਲਕ੍ਸ਼਼੍ਮੀਵਾਨ੍ ਸਮਿਤਿਞ੍ਜਯਃ ॥ 39॥

ਵਿਕ੍ਸ਼਼ਰੋ ਰੋਹਿਤੋ ਮਾਰ੍ਗੋ ਹੇਤੁਰ੍ਦਾਮੋਦਰਃ ਸਹਃ ।
ਮਹੀਧਰੋ ਮਹਾਭਾਗੋ ਵੇਗਵਾਨਮਿਤਾਸ਼ਨਃ ॥ 40॥

ਉਦ੍ਭਵਃ ਕ੍ਸ਼਼ੋਭਣੋ ਦੇਵਃ ਸ਼੍ਰੀਗਰ੍ਭਃ ਪਰਮੇਸ਼੍ਵਰਃ ।
ਕਰਣੰ ਕਾਰਣੰ ਕਰ੍ਤਾ ਵਿਕਰ੍ਤਾ ਗਹਨੋ ਗੁਹਃ ॥ 41॥

ਵ੍ਯਵਸਾਯੋ ਵ੍ਯਵਸ੍ਥਾਨਃ ਸੰਸ੍ਥਾਨਃ ਸ੍ਥਾਨਦੋ ਧ੍ਰੁਵਃ ।
ਪਰਰ੍ੱਧਿਃ ਪਰਮਸ੍ਪਸ਼਼੍ਟਸ੍ਤੁਸ਼਼੍ਟਃ ਪੁਸ਼਼੍ਟਃ ਸ਼ੁਭੇਕ੍ਸ਼਼ਣਃ ॥ 42॥

ਰਾਮੋ ਵਿਰਾਮੋ ਵਿਰਜੋ ਮਾਰ੍ਗੋ ਨੇਯੋ ਨਯੋ(ਅ)ਨਯਃ । or ਵਿਰਾਮੋ ਵਿਰਤੋ
ਵੀਰਃ ਸ਼ਕ੍ਤਿਮਤਾਂ ਸ਼੍ਰੇਸ਼਼੍ਠੋ ਧਰ੍ਮੋ ਧਰ੍ਮਵਿਦੁੱਤਮਃ ॥ 43॥

ਵੈਕੁਣ੍ਠਃ ਪੁਰੁਸ਼਼ਃ ਪ੍ਰਾਣਃ ਪ੍ਰਾਣਦਃ ਪ੍ਰਣਵਃ ਪ੍ਰੁਥੁਃ ।
ਹਿਰਣ੍ਯਗਰ੍ਭਃ ਸ਼ਤ੍ਰੁਘ੍ਨੋ ਵ੍ਯਾਪ੍ਤੋ ਵਾਯੁਰਧੋਕ੍ਸ਼਼ਜਃ ॥ 44॥

ਰੁਤੁਃ ਸੁਦਰ੍ਸ਼ਨਃ ਕਾਲਃ ਪਰਮੇਸ਼਼੍ਠੀ ਪਰਿਗ੍ਰਹਃ ।
ਉਗ੍ਰਃ ਸੰਵਤ੍ਸਰੋ ਦਕ੍ਸ਼਼ੋ ਵਿਸ਼੍ਰਾਮੋ ਵਿਸ਼੍ਵਦਕ੍ਸ਼਼ਿਣਃ ॥ 45॥

ਵਿਸ੍ਤਾਰਃ ਸ੍ਥਾਵਰਸ੍ਥਾਣੁਃ ਪ੍ਰਮਾਣੰ ਬੀਜਮਵ੍ਯਯਮ੍ ।
ਅਰ੍ਥੋ(ਅ)ਨਰ੍ਥੋ ਮਹਾਕੋਸ਼ੋ ਮਹਾਭੋਗੋ ਮਹਾਧਨਃ ॥ 46॥

ਅਨਿਰ੍ਵਿੱਣਃ ਸ੍ਥਵਿਸ਼਼੍ਠੋ(ਅ)ਭੂਰ੍ਧਰ੍ਮਯੂਪੋ ਮਹਾਮਖਃ ।
ਨਕ੍ਸ਼਼ਤ੍ਰਨੇਮਿਰ੍ਨਕ੍ਸ਼਼ਤ੍ਰੀ ਕ੍ਸ਼਼ਮਃ ਕ੍ਸ਼਼ਾਮਃ ਸਮੀਹਨਃ ॥ 47॥

ਯਜ੍ਞ ਇਜ੍ਯੋ ਮਹੇਜ੍ਯਸ਼੍ਚ ਕ੍ਰਤੁਃ ਸਤ੍ਰੰ ਸਤਾਂ ਗਤਿਃ ।
ਸਰ੍ਵਦਰ੍ਸ਼ੀ ਵਿਮੁਕ੍ਤਾਤ੍ਮਾ ਸਰ੍ਵਜ੍ਞੋ ਜ੍ਞਾਨਮੁੱਤਮਮ੍ ॥ 48॥

ਸੁਵ੍ਰਤਃ ਸੁਮੁਖਃ ਸੂਕ੍ਸ਼਼੍ਮਃ ਸੁਘੋਸ਼਼ਃ ਸੁਖਦਃ ਸੁਹ੍ਰੁਤ੍ ।
ਮਨੋਹਰੋ ਜਿਤਕ੍ਰੋਧੋ ਵੀਰਬਾਹੁਰ੍ਵਿਦਾਰਣਃ ॥ 49॥

ਸ੍ਵਾਪਨਃ ਸ੍ਵਵਸ਼ੋ ਵ੍ਯਾਪੀ ਨੈਕਾਤ੍ਮਾ ਨੈਕਕਰ੍ਮਕ੍ਰੁਤ੍ ।
ਵਤ੍ਸਰੋ ਵਤ੍ਸਲੋ ਵਤ੍ਸੀ ਰਤ੍ਨਗਰ੍ਭੋ ਧਨੇਸ਼੍ਵਰਃ ॥ 50॥

ਧਰ੍ਮਗੁਬ੍ਧਰ੍ਮਕ੍ਰੁੱਧਰ੍ਮੀ ਸਦਸਤ੍ਕ੍ਸ਼਼ਰਮਕ੍ਸ਼਼ਰਮ੍ ।
ਅਵਿਜ੍ਞਾਤਾ ਸਹਸ੍ਰਾਂਸ਼ੁਰ੍ਵਿਧਾਤਾ ਕ੍ਰੁਤਲਕ੍ਸ਼਼ਣਃ ॥ 51॥

ਗਭਸ੍ਤਿਨੇਮਿਃ ਸੱਤ੍ਵਸ੍ਥਃ ਸਿੰਹੋ ਭੂਤਮਹੇਸ਼੍ਵਰਃ ।
ਆਦਿਦੇਵੋ ਮਹਾਦੇਵੋ ਦੇਵੇਸ਼ੋ ਦੇਵਭ੍ਰੁਦ੍ਗੁਰੁਃ ॥ 52॥

ਉੱਤਰੋ ਗੋਪਤਿਰ੍ਗੋਪ੍ਤਾ ਜ੍ਞਾਨਗਮ੍ਯਃ ਪੁਰਾਤਨਃ ।
ਸ਼ਰੀਰਭੂਤਭ੍ਰੁਦ੍ਭੋਕ੍ਤਾ ਕਪੀਨ੍ਦ੍ਰੋ ਭੂਰਿਦਕ੍ਸ਼਼ਿਣਃ ॥ 53॥

ਸੋਮਪੋ(ਅ)ਮ੍ਰੁਤਪਃ ਸੋਮਃ ਪੁਰੁਜਿਤ੍ਪੁਰੁਸੱਤਮਃ ।
ਵਿਨਯੋ ਜਯਃ ਸਤ੍ਯਸਨ੍ਧੋ ਦਾਸ਼ਾਰ੍ਹਃ ਸਾਤ੍ਵਤਾਮ੍ਪਤਿਃ ॥ 54॥ ਵਿਨਿਯੋਜ੍ਯਃ

ਜੀਵੋ ਵਿਨਯਿਤਾ ਸਾਕ੍ਸ਼਼ੀ ਮੁਕੁਨ੍ਦੋ(ਅ)ਮਿਤਵਿਕ੍ਰਮਃ ।
ਅਮ੍ਭੋਨਿਧਿਰਨਨ੍ਤਾਤ੍ਮਾ ਮਹੋਦਧਿਸ਼ਯੋ(ਅ)ਨ੍ਤਕਃ ॥ 55॥

ਅਜੋ ਮਹਾਰ੍ਹਃ ਸ੍ਵਾਭਾਵ੍ਯੋ ਜਿਤਾਮਿਤ੍ਰਃ ਪ੍ਰਮੋਦਨਃ ।
ਆਨਨ੍ਦੋ ਨਨ੍ਦਨੋ ਨਨ੍ਦਃ ਸਤ੍ਯਧਰ੍ਮਾ ਤ੍ਰਿਵਿਕ੍ਰਮਃ ॥ 56॥

ਮਹਰ੍ਸ਼਼ਿਃ ਕਪਿਲਾਚਾਰ੍ਯਃ ਕ੍ਰੁਤਜ੍ਞੋ ਮੇਦਿਨੀਪਤਿਃ ।
ਤ੍ਰਿਪਦਸ੍ਤ੍ਰਿਦਸ਼ਾਧ੍ਯਕ੍ਸ਼਼ੋ ਮਹਾਸ਼੍ਰੁਙ੍ਗਃ ਕ੍ਰੁਤਾਨ੍ਤਕ੍ਰੁਤ੍ ॥ 57॥

ਮਹਾਵਰਾਹੋ ਗੋਵਿਨ੍ਦਃ ਸੁਸ਼਼ੇਣਃ ਕਨਕਾਙ੍ਗਦੀ ।
ਗੁਹ੍ਯੋ ਗਭੀਰੋ ਗਹਨੋ ਗੁਪ੍ਤਸ਼੍ਚਕ੍ਰਗਦਾਧਰਃ ॥ 58॥

ਵੇਧਾਃ ਸ੍ਵਾਙ੍ਗੋ(ਅ)ਜਿਤਃ ਕ੍ਰੁਸ਼਼੍ਣੋ ਦ੍ਰੁਢਃ ਸਙ੍ਕਰ੍ਸ਼਼ਣੋ(ਅ)ਚ੍ਯੁਤਃ ।
ਵਰੁਣੋ ਵਾਰੁਣੋ ਵ੍ਰੁਕ੍ਸ਼਼ਃ ਪੁਸ਼਼੍ਕਰਾਕ੍ਸ਼਼ੋ ਮਹਾਮਨਾਃ ॥ 59॥

ਭਗਵਾਨ੍ ਭਗਹਾ(ਆ)ਨਨ੍ਦੀ ਵਨਮਾਲੀ ਹਲਾਯੁਧਃ ।
ਆਦਿਤ੍ਯੋ ਜ੍ਯੋਤਿਰਾਦਿਤ੍ਯਃ ਸਹਿਸ਼਼੍ਣੁਰ੍ਗਤਿਸੱਤਮਃ ॥ 60॥

ਸੁਧਨ੍ਵਾ ਖਣ੍ਡਪਰਸ਼ੁਰ੍ਦਾਰੁਣੋ ਦ੍ਰਵਿਣਪ੍ਰਦਃ ।
ਦਿਵਸ੍ਪ੍ਰੁਕ੍ ਸਰ੍ਵਦ੍ਰੁਗ੍ਵ੍ਯਾਸੋ ਵਾਚਸ੍ਪਤਿਰਯੋਨਿਜਃ ॥ 61॥ var ਦਿਵਿਸ੍ਪ੍ਰੁਕ੍
ਤ੍ਰਿਸਾਮਾ ਸਾਮਗਃ ਸਾਮ ਨਿਰ੍ਵਾਣੰ ਭੇਸ਼਼ਜੰ ਭਿਸ਼਼ਕ੍ ।
ਸੰਨ੍ਯਾਸਕ੍ਰੁੱਛਮਃ ਸ਼ਾਨ੍ਤੋ ਨਿਸ਼਼੍ਠਾ ਸ਼ਾਨ੍ਤਿਃ ਪਰਾਯਣਮ੍ ॥ 62॥

ਸ਼ੁਭਾਙ੍ਗਃ ਸ਼ਾਨ੍ਤਿਦਃ ਸ੍ਰਸ਼਼੍ਟਾ ਕੁਮੁਦਃ ਕੁਵਲੇਸ਼ਯਃ ।
ਗੋਹਿਤੋ ਗੋਪਤਿਰ੍ਗੋਪ੍ਤਾ ਵ੍ਰੁਸ਼਼ਭਾਕ੍ਸ਼਼ੋ ਵ੍ਰੁਸ਼਼ਪ੍ਰਿਯਃ ॥ 63॥

ਅਨਿਵਰ੍ਤੀ ਨਿਵ੍ਰੁੱਤਾਤ੍ਮਾ ਸਙ੍ਕ੍ਸ਼਼ੇਪ੍ਤਾ ਕ੍ਸ਼਼ੇਮਕ੍ਰੁੱਛਿਵਃ ।
ਸ਼੍ਰੀਵਤ੍ਸਵਕ੍ਸ਼਼ਾਃ ਸ਼੍ਰੀਵਾਸਃ ਸ਼੍ਰੀਪਤਿਃ ਸ਼੍ਰੀਮਤਾਂਵਰਃ ॥ 64॥

ਸ਼੍ਰੀਦਃ ਸ਼੍ਰੀਸ਼ਃ ਸ਼੍ਰੀਨਿਵਾਸਃ ਸ਼੍ਰੀਨਿਧਿਃ ਸ਼੍ਰੀਵਿਭਾਵਨਃ ।
ਸ਼੍ਰੀਧਰਃ ਸ਼੍ਰੀਕਰਃ ਸ਼੍ਰੇਯਃ ਸ਼੍ਰੀਮਾਂੱਲੋਕਤ੍ਰਯਾਸ਼੍ਰਯਃ ॥ 65॥

ਸ੍ਵਕ੍ਸ਼਼ਃ ਸ੍ਵਙ੍ਗਃ ਸ਼ਤਾਨਨ੍ਦੋ ਨਨ੍ਦਿਰ੍ਜ੍ਯੋਤਿਰ੍ਗਣੇਸ਼੍ਵਰਃ ।
ਵਿਜਿਤਾਤ੍ਮਾ(ਅ)ਵਿਧੇਯਾਤ੍ਮਾ ਸਤ੍ਕੀਰ੍ਤਿਸ਼੍ਛਿੰਨਸੰਸ਼ਯਃ ॥ 66॥

ਉਦੀਰ੍ਣਃ ਸਰ੍ਵਤਸ਼੍ਚਕ੍ਸ਼਼ੁਰਨੀਸ਼ਃ ਸ਼ਾਸ਼੍ਵਤਸ੍ਥਿਰਃ ।
ਭੂਸ਼ਯੋ ਭੂਸ਼਼ਣੋ ਭੂਤਿਰ੍ਵਿਸ਼ੋਕਃ ਸ਼ੋਕਨਾਸ਼ਨਃ ॥ 67॥

ਅਰ੍ਚਿਸ਼਼੍ਮਾਨਰ੍ਚਿਤਃ ਕੁਮ੍ਭੋ ਵਿਸ਼ੁੱਧਾਤ੍ਮਾ ਵਿਸ਼ੋਧਨਃ ।
ਅਨਿਰੁੱਧੋ(ਅ)ਪ੍ਰਤਿਰਥਃ ਪ੍ਰਦ੍ਯੁਮ੍ਨੋ(ਅ)ਮਿਤਵਿਕ੍ਰਮਃ ॥ 68॥

ਕਾਲਨੇਮਿਨਿਹਾ ਵੀਰਃ ਸ਼ੌਰਿਃ ਸ਼ੂਰਜਨੇਸ਼੍ਵਰਃ ।
ਤ੍ਰਿਲੋਕਾਤ੍ਮਾ ਤ੍ਰਿਲੋਕੇਸ਼ਃ ਕੇਸ਼ਵਃ ਕੇਸ਼ਿਹਾ ਹਰਿਃ ॥ 69॥

ਕਾਮਦੇਵਃ ਕਾਮਪਾਲਃ ਕਾਮੀ ਕਾਨ੍ਤਃ ਕ੍ਰੁਤਾਗਮਃ ।
ਅਨਿਰ੍ਦੇਸ਼੍ਯਵਪੁਰ੍ਵਿਸ਼਼੍ਣੁਰ੍ਵੀਰੋ(ਅ)ਨਨ੍ਤੋ ਧਨਞ੍ਜਯਃ ॥ 70॥

ਬ੍ਰਹ੍ਮਣ੍ਯੋ ਬ੍ਰਹ੍ਮਕ੍ਰੁਦ੍ ਬ੍ਰਹ੍ਮਾ ਬ੍ਰਹ੍ਮ ਬ੍ਰਹ੍ਮਵਿਵਰ੍ਧਨਃ ।
ਬ੍ਰਹ੍ਮਵਿਦ੍ ਬ੍ਰਾਹ੍ਮਣੋ ਬ੍ਰਹ੍ਮੀ ਬ੍ਰਹ੍ਮਜ੍ਞੋ ਬ੍ਰਾਹ੍ਮਣਪ੍ਰਿਯਃ ॥ 71॥

ਮਹਾਕ੍ਰਮੋ ਮਹਾਕਰ੍ਮਾ ਮਹਾਤੇਜਾ ਮਹੋਰਗਃ ।
ਮਹਾਕ੍ਰਤੁਰ੍ਮਹਾਯਜ੍ਵਾ ਮਹਾਯਜ੍ਞੋ ਮਹਾਹਵਿਃ ॥ 72॥

ਸ੍ਤਵ੍ਯਃ ਸ੍ਤਵਪ੍ਰਿਯਃ ਸ੍ਤੋਤ੍ਰੰ ਸ੍ਤੁਤਿਃ ਸ੍ਤੋਤਾ ਰਣਪ੍ਰਿਯਃ ।
ਪੂਰ੍ਣਃ ਪੂਰਯਿਤਾ ਪੁਣ੍ਯਃ ਪੁਣ੍ਯਕੀਰ੍ਤਿਰਨਾਮਯਃ ॥ 73॥

ਮਨੋਜਵਸ੍ਤੀਰ੍ਥਕਰੋ ਵਸੁਰੇਤਾ ਵਸੁਪ੍ਰਦਃ ।
ਵਸੁਪ੍ਰਦੋ ਵਾਸੁਦੇਵੋ ਵਸੁਰ੍ਵਸੁਮਨਾ ਹਵਿਃ ॥ 74॥

ਸਦ੍ਗਤਿਃ ਸਤ੍ਕ੍ਰੁਤਿਃ ਸੱਤਾ ਸਦ੍ਭੂਤਿਃ ਸਤ੍ਪਰਾਯਣਃ ।
ਸ਼ੂਰਸੇਨੋ ਯਦੁਸ਼੍ਰੇਸ਼਼੍ਠਃ ਸੰਨਿਵਾਸਃ ਸੁਯਾਮੁਨਃ ॥ 75॥

ਭੂਤਾਵਾਸੋ ਵਾਸੁਦੇਵਃ ਸਰ੍ਵਾਸੁਨਿਲਯੋ(ਅ)ਨਲਃ ।
ਦਰ੍ਪਹਾ ਦਰ੍ਪਦੋ ਦ੍ਰੁਪ੍ਤੋ ਦੁਰ੍ਧਰੋ(ਅ)ਥਾਪਰਾਜਿਤਃ ॥ 76॥

ਵਿਸ਼੍ਵਮੂਰ੍ਤਿਰ੍ਮਹਾਮੂਰ੍ਤਿਰ੍ਦੀਪ੍ਤਮੂਰ੍ਤਿਰਮੂਰ੍ਤਿਮਾਨ੍ ।
ਅਨੇਕਮੂਰ੍ਤਿਰਵ੍ਯਕ੍ਤਃ ਸ਼ਤਮੂਰ੍ਤਿਃ ਸ਼ਤਾਨਨਃ ॥ 77॥

ਏਕੋ ਨੈਕਃ ਸਵਃ ਕਃ ਕਿੰ ਯਤ੍ ਤਤ੍ਪਦਮਨੁੱਤਮਮ੍ ।
ਲੋਕਬਨ੍ਧੁਰ੍ਲੋਕਨਾਥੋ ਮਾਧਵੋ ਭਕ੍ਤਵਤ੍ਸਲਃ ॥ 78॥

ਸੁਵਰ੍ਣਵਰ੍ਣੋ ਹੇਮਾਙ੍ਗੋ ਵਰਾਙ੍ਗਸ਼੍ਚਨ੍ਦਨਾਙ੍ਗਦੀ ।
ਵੀਰਹਾ ਵਿਸ਼਼ਮਃ ਸ਼ੂਨ੍ਯੋ ਘ੍ਰੁਤਾਸ਼ੀਰਚਲਸ਼੍ਚਲਃ ॥ 79॥

ਅਮਾਨੀ ਮਾਨਦੋ ਮਾਨ੍ਯੋ ਲੋਕਸ੍ਵਾਮੀ ਤ੍ਰਿਲੋਕਧ੍ਰੁਕ੍ ।
ਸੁਮੇਧਾ ਮੇਧਜੋ ਧਨ੍ਯਃ ਸਤ੍ਯਮੇਧਾ ਧਰਾਧਰਃ ॥ 80॥

ਤੇਜੋਵ੍ਰੁਸ਼਼ੋ ਦ੍ਯੁਤਿਧਰਃ ਸਰ੍ਵਸ਼ਸ੍ਤ੍ਰਭ੍ਰੁਤਾਂ ਵਰਃ ।
ਪ੍ਰਗ੍ਰਹੋ ਨਿਗ੍ਰਹੋ ਵ੍ਯਗ੍ਰੋ ਨੈਕਸ਼੍ਰੁਙ੍ਗੋ ਗਦਾਗ੍ਰਜਃ ॥ 81॥

ਚਤੁਰ੍ਮੂਰ੍ਤਿਸ਼੍ਚਤੁਰ੍ਬਾਹੁਸ਼੍ਚਤੁਰ੍ਵ੍ਯੂਹਸ਼੍ਚਤੁਰ੍ਗਤਿਃ ।
ਚਤੁਰਾਤ੍ਮਾ ਚਤੁਰ੍ਭਾਵਸ਼੍ਚਤੁਰ੍ਵੇਦਵਿਦੇਕਪਾਤ੍ ॥ 82॥

ਸਮਾਵਰ੍ਤੋ(ਅ)ਨਿਵ੍ਰੁੱਤਾਤ੍ਮਾ ਦੁਰ੍ਜਯੋ ਦੁਰਤਿਕ੍ਰਮਃ ।
ਦੁਰ੍ਲਭੋ ਦੁਰ੍ਗਮੋ ਦੁਰ੍ਗੋ ਦੁਰਾਵਾਸੋ ਦੁਰਾਰਿਹਾ ॥ 83॥

ਸ਼ੁਭਾਙ੍ਗੋ ਲੋਕਸਾਰਙ੍ਗਃ ਸੁਤਨ੍ਤੁਸ੍ਤਨ੍ਤੁਵਰ੍ਧਨਃ ।
ਇਨ੍ਦ੍ਰਕਰ੍ਮਾ ਮਹਾਕਰ੍ਮਾ ਕ੍ਰੁਤਕਰ੍ਮਾ ਕ੍ਰੁਤਾਗਮਃ ॥ 84॥

ਉਦ੍ਭਵਃ ਸੁਨ੍ਦਰਃ ਸੁਨ੍ਦੋ ਰਤ੍ਨਨਾਭਃ ਸੁਲੋਚਨਃ ।
ਅਰ੍ਕੋ ਵਾਜਸਨਃ ਸ਼੍ਰੁਙ੍ਗੀ ਜਯਨ੍ਤਃ ਸਰ੍ਵਵਿੱਜਯੀ ॥ 85॥

ਸੁਵਰ੍ਣਬਿਨ੍ਦੁਰਕ੍ਸ਼਼ੋਭ੍ਯਃ ਸਰ੍ਵਵਾਗੀਸ਼੍ਵਰੇਸ਼੍ਵਰਃ ।
ਮਹਾਹ੍ਰਦੋ ਮਹਾਗਰ੍ਤੋ ਮਹਾਭੂਤੋ ਮਹਾਨਿਧਿਃ ॥ 86॥

ਕੁਮੁਦਃ ਕੁਨ੍ਦਰਃ ਕੁਨ੍ਦਃ ਪਰ੍ਜਨ੍ਯਃ ਪਾਵਨੋ(ਅ)ਨਿਲਃ ।
ਅਮ੍ਰੁਤਾਸ਼ੋ(ਅ)ਮ੍ਰੁਤਵਪੁਃ ਸਰ੍ਵਜ੍ਞਃ ਸਰ੍ਵਤੋਮੁਖਃ ॥ 87॥

ਸੁਲਭਃ ਸੁਵ੍ਰਤਃ ਸਿੱਧਃ ਸ਼ਤ੍ਰੁਜਿੱਛਤ੍ਰੁਤਾਪਨਃ ।
ਨ੍ਯਗ੍ਰੋਧੋ(ਅ)ਦੁਮ੍ਬਰੋ(ਅ)ਸ਼੍ਵੱਥਸ਼੍ਚਾਣੂਰਾਨ੍ਧ੍ਰਨਿਸ਼਼ੂਦਨਃ ॥ 88॥

ਸਹਸ੍ਰਾਰ੍ਚਿਃ ਸਪ੍ਤਜਿਹ੍ਵਃ ਸਪ੍ਤੈਧਾਃ ਸਪ੍ਤਵਾਹਨਃ ।
ਅਮੂਰ੍ਤਿਰਨਘੋ(ਅ)ਚਿਨ੍ਤ੍ਯੋ ਭਯਕ੍ਰੁਦ੍ਭਯਨਾਸ਼ਨਃ ॥ 89॥

ਅਣੁਰ੍ਬ੍ਰੁਹਤ੍ਕ੍ਰੁਸ਼ਃ ਸ੍ਥੂਲੋ ਗੁਣਭ੍ਰੁੰਨਿਰ੍ਗੁਣੋ ਮਹਾਨ੍ ।
ਅਧ੍ਰੁਤਃ ਸ੍ਵਧ੍ਰੁਤਃ ਸ੍ਵਾਸ੍ਯਃ ਪ੍ਰਾਗ੍ਵੰਸ਼ੋ ਵੰਸ਼ਵਰ੍ਧਨਃ ॥ 90॥

ਭਾਰਭ੍ਰੁਤ੍ ਕਥਿਤੋ ਯੋਗੀ ਯੋਗੀਸ਼ਃ ਸਰ੍ਵਕਾਮਦਃ ।
ਆਸ਼੍ਰਮਃ ਸ਼੍ਰਮਣਃ ਕ੍ਸ਼਼ਾਮਃ ਸੁਪਰ੍ਣੋ ਵਾਯੁਵਾਹਨਃ ॥ 91॥

ਧਨੁਰ੍ਧਰੋ ਧਨੁਰ੍ਵੇਦੋ ਦਣ੍ਡੋ ਦਮਯਿਤਾ ਦਮਃ ।
ਅਪਰਾਜਿਤਃ ਸਰ੍ਵਸਹੋ ਨਿਯਨ੍ਤਾ(ਅ)ਨਿਯਮੋ(ਅ)ਯਮਃ ॥ 92॥

ਸੱਤ੍ਵਵਾਨ੍ ਸਾੱਤ੍ਵਿਕਃ ਸਤ੍ਯਃ ਸਤ੍ਯਧਰ੍ਮਪਰਾਯਣਃ ।
ਅਭਿਪ੍ਰਾਯਃ ਪ੍ਰਿਯਾਰ੍ਹੋ(ਅ)ਰ੍ਹਃ ਪ੍ਰਿਯਕ੍ਰੁਤ੍ ਪ੍ਰੀਤਿਵਰ੍ਧਨਃ ॥ 93॥

ਵਿਹਾਯਸਗਤਿਰ੍ਜ੍ਯੋਤਿਃ ਸੁਰੁਚਿਰ੍ਹੁਤਭੁਗ੍ਵਿਭੁਃ ।
ਰਵਿਰ੍ਵਿਰੋਚਨਃ ਸੂਰ੍ਯਃ ਸਵਿਤਾ ਰਵਿਲੋਚਨਃ ॥ 94॥

ਅਨਨ੍ਤੋ ਹੁਤਭੁਗ੍ਭੋਕ੍ਤਾ ਸੁਖਦੋ ਨੈਕਜੋ(ਅ)ਗ੍ਰਜਃ ।
ਅਨਿਰ੍ਵਿੱਣਃ ਸਦਾਮਰ੍ਸ਼਼ੀ ਲੋਕਾਧਿਸ਼਼੍ਠਾਨਮਦ੍ਭੁਤਃ ॥ 95॥

ਸਨਾਤ੍ਸਨਾਤਨਤਮਃ ਕਪਿਲਃ ਕਪਿਰਵ੍ਯਯਃ ।
ਸ੍ਵਸ੍ਤਿਦਃ ਸ੍ਵਸ੍ਤਿਕ੍ਰੁਤ੍ਸ੍ਵਸ੍ਤਿ ਸ੍ਵਸ੍ਤਿਭੁਕ੍ਸ੍ਵਸ੍ਤਿਦਕ੍ਸ਼਼ਿਣਃ ॥ 96॥

ਅਰੌਦ੍ਰਃ ਕੁਣ੍ਡਲੀ ਚਕ੍ਰੀ ਵਿਕ੍ਰਮ੍ਯੂਰ੍ਜਿਤਸ਼ਾਸਨਃ ।
ਸ਼ਬ੍ਦਾਤਿਗਃ ਸ਼ਬ੍ਦਸਹਃ ਸ਼ਿਸ਼ਿਰਃ ਸ਼ਰ੍ਵਰੀਕਰਃ ॥ 97॥

ਅਕ੍ਰੂਰਃ ਪੇਸ਼ਲੋ ਦਕ੍ਸ਼਼ੋ ਦਕ੍ਸ਼਼ਿਣਃ ਕ੍ਸ਼਼ਮਿਣਾਂਵਰਃ ।
ਵਿਦ੍ਵੱਤਮੋ ਵੀਤਭਯਃ ਪੁਣ੍ਯਸ਼੍ਰਵਣਕੀਰ੍ਤਨਃ ॥ 98॥

ਉੱਤਾਰਣੋ ਦੁਸ਼਼੍ਕ੍ਰੁਤਿਹਾ ਪੁਣ੍ਯੋ ਦੁਃਸ੍ਵਪ੍ਨਨਾਸ਼ਨਃ ।
ਵੀਰਹਾ ਰਕ੍ਸ਼਼ਣਃ ਸਨ੍ਤੋ ਜੀਵਨਃ ਪਰ੍ਯਵਸ੍ਥਿਤਃ ॥ 99॥

ਅਨਨ੍ਤਰੂਪੋ(ਅ)ਨਨ੍ਤਸ਼੍ਰੀਰ੍ਜਿਤਮਨ੍ਯੁਰ੍ਭਯਾਪਹਃ ।
ਚਤੁਰਸ਼੍ਰੋ ਗਭੀਰਾਤ੍ਮਾ ਵਿਦਿਸ਼ੋ ਵ੍ਯਾਦਿਸ਼ੋ ਦਿਸ਼ਃ ॥ 100॥

ਅਨਾਦਿਰ੍ਭੂਰ੍ਭੁਵੋ ਲਕ੍ਸ਼਼੍ਮੀਃ ਸੁਵੀਰੋ ਰੁਚਿਰਾਙ੍ਗਦਃ ।
ਜਨਨੋ ਜਨਜਨ੍ਮਾਦਿਰ੍ਭੀਮੋ ਭੀਮਪਰਾਕ੍ਰਮਃ ॥ 101॥

ਆਧਾਰਨਿਲਯੋ(ਅ)ਧਾਤਾ ਪੁਸ਼਼੍ਪਹਾਸਃ ਪ੍ਰਜਾਗਰਃ ।
ਊਰ੍ਧ੍ਵਗਃ ਸਤ੍ਪਥਾਚਾਰਃ ਪ੍ਰਾਣਦਃ ਪ੍ਰਣਵਃ ਪਣਃ ॥ 102॥

ਪ੍ਰਮਾਣੰ ਪ੍ਰਾਣਨਿਲਯਃ ਪ੍ਰਾਣਭ੍ਰੁਤ੍ਪ੍ਰਾਣਜੀਵਨਃ ।
ਤੱਤ੍ਵੰ ਤੱਤ੍ਵਵਿਦੇਕਾਤ੍ਮਾ ਜਨ੍ਮਮ੍ਰੁਤ੍ਯੁਜਰਾਤਿਗਃ ॥ 103॥

ਭੂਰ੍ਭੁਵਃਸ੍ਵਸ੍ਤਰੁਸ੍ਤਾਰਃ ਸਵਿਤਾ ਪ੍ਰਪਿਤਾਮਹਃ ।
ਯਜ੍ਞੋ ਯਜ੍ਞਪਤਿਰ੍ਯਜ੍ਵਾ ਯਜ੍ਞਾਙ੍ਗੋ ਯਜ੍ਞਵਾਹਨਃ ॥ 104॥

ਯਜ੍ਞਭ੍ਰੁਦ੍ ਯਜ੍ਞਕ੍ਰੁਦ੍ ਯਜ੍ਞੀ ਯਜ੍ਞਭੁਗ੍ ਯਜ੍ਞਸਾਧਨਃ ।
ਯਜ੍ਞਾਨ੍ਤਕ੍ਰੁਦ੍ ਯਜ੍ਞਗੁਹ੍ਯਮੰਨਮੰਨਾਦ ਏਵ ਚ ॥ 105॥

ਆਤ੍ਮਯੋਨਿਃ ਸ੍ਵਯਞ੍ਜਾਤੋ ਵੈਖਾਨਃ ਸਾਮਗਾਯਨਃ ।
ਦੇਵਕੀਨਨ੍ਦਨਃ ਸ੍ਰਸ਼਼੍ਟਾ ਕ੍ਸ਼਼ਿਤੀਸ਼ਃ ਪਾਪਨਾਸ਼ਨਃ ॥ 106॥

ਸ਼ਙ੍ਖਭ੍ਰੁੰਨਨ੍ਦਕੀ ਚਕ੍ਰੀ ਸ਼ਾਰ੍ਙ੍ਗਧਨ੍ਵਾ ਗਦਾਧਰਃ ।
ਰਥਾਙ੍ਗਪਾਣਿਰਕ੍ਸ਼਼ੋਭ੍ਯਃ ਸਰ੍ਵਪ੍ਰਹਰਣਾਯੁਧਃ ॥ 107॥

ਸਰ੍ਵਪ੍ਰਹਰਣਾਯੁਧ ੴ ਨਮ ਇਤਿ ।
ਵਨਮਾਲੀ ਗਦੀ ਸ਼ਾਰ੍ਙ੍ਗੀ ਸ਼ਙ੍ਖੀ ਚਕ੍ਰੀ ਚ ਨਨ੍ਦਕੀ ।
ਸ਼੍ਰੀਮਾਨ੍ ਨਾਰਾਯਣੋ ਵਿਸ਼਼੍ਣੁਰ੍ਵਾਸੁਦੇਵੋ(ਅ)ਭਿਰਕ੍ਸ਼਼ਤੁ ॥ 108॥

ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਸਹਸ੍ਰਨਾਮ ਸ੍ਤੋਤ੍ਰ ਦਾ ਮਹੱਤਵ

ਭਗਵਾਨ ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਨੂੰ ਸੰਸਾਰ ਦਾ ਪਾਲਣਹਾਰ ਮੰਨਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸਹਸ੍ਰਨਾਮ ਦਾ ਪਾਠ ਕਰਨ ਨਾਲ ਸ਼ਰਧਾਲੂਆਂ ਨੂੰ ਆਤਮਿਕ ਬਲ ਅਤੇ ਮਾਨਸਿਕ ਸ਼ਾਂਤੀ ਮਿਲਦੀ ਹੈ। ਇਸ ਸਤੋਤਰ ਦਾ ਨਾ ਸਿਰਫ਼ ਧਾਰਮਿਕ ਮਹੱਤਵ ਹੈ ਸਗੋਂ ਇਹ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਨੈਤਿਕ ਅਤੇ ਭੌਤਿਕ ਤਰੱਕੀ ਵੱਲ ਵੀ ਲੈ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਸਹਸ੍ਰਨਾਮ ਦਾ ਪਾਠ ਕਿਵੇਂ ਕਰੀਏ?

ਤਿਆਰੀ: ਇਸ਼ਨਾਨ ਕਰੋ, ਸਾਫ਼ ਕੱਪੜੇ ਪਾਓ ਅਤੇ ਪੂਜਾ ਸਥਾਨ ਨੂੰ ਸਾਫ਼ ਕਰੋ।
ਪੂਜਾ ਸਥਾਨ ਦੀ ਸਜਾਵਟ: ਭਗਵਾਨ ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਦੀ ਮੂਰਤੀ ਜਾਂ ਤਸਵੀਰ ਦੇ ਸਾਹਮਣੇ ਦੀਵਾ ਜਗਾਓ ਅਤੇ ਫੁੱਲ ਚੜ੍ਹਾਓ।
ਮੰਤਰ ਜਾਪ: ‘ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਸਹਸ੍ਰਨਾਮ ਸਤੋਤਰ’ ਦਾ ਪਾਠ ਚੁੱਪ ਅਤੇ ਧਿਆਨ ਨਾਲ ਕਰੋ। ਹਰੇਕ ਨਾਮ ਦਾ ਸਪਸ਼ਟ ਉਚਾਰਨ ਕਰੋ।
ਧਿਆਨ: ਪਾਠ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, ਕੁਝ ਦੇਰ ਲਈ ਧਿਆਨ ਵਿੱਚ ਬੈਠੋ ਅਤੇ ਭਗਵਾਨ ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਦੇ ਬ੍ਰਹਮ ਗੁਣਾਂ ਦਾ ਚਿੰਤਨ ਕਰੋ।

ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਸਹਸ੍ਰਨਾਮ ਸਤੋਤ੍ਰ ਦੇ ਲਾਭ

ਮਾਨਸਿਕ ਸ਼ਾਂਤੀ: ਨਿਯਮਿਤ ਪਾਠ ਕਰਨ ਨਾਲ ਮਾਨਸਿਕ ਤਣਾਅ ਅਤੇ ਚਿੰਤਾ ਘੱਟ ਹੁੰਦੀ ਹੈ।
ਅਧਿਆਤਮਿਕ ਤਰੱਕੀ: ਇਸ ਦੇ ਪਾਠ ਨਾਲ ਅਧਿਆਤਮਿਕ ਬਲ ਵਧਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਵਿਅਕਤੀ ਅਧਿਆਤਮਿਕ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਉੱਨਤ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।
ਸੁਰੱਖਿਆ ਅਤੇ ਸੁਰੱਖਿਆ: ਇਹ ਮੰਨਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਸਹਸ੍ਰਨਾਮ ਦਾ ਪਾਠ ਜੀਵਨ ਦੀਆਂ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਰੁਕਾਵਟਾਂ ਅਤੇ ਨਕਾਰਾਤਮਕ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਤੋਂ ਸੁਰੱਖਿਆ ਪ੍ਰਦਾਨ ਕਰਦਾ ਹੈ।
ਭੌਤਿਕ ਲਾਭ: ਇਸ ਦਾ ਪਾਠ ਨਾ ਸਿਰਫ਼ ਅਧਿਆਤਮਿਕ ਸਗੋਂ ਭੌਤਿਕ ਲਾਭ ਵੀ ਪ੍ਰਦਾਨ ਕਰਦਾ ਹੈ।

ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਸਹਸ੍ਰਨਾਮ ਸਤੋਤਰ ਦਾ ਪਾਠ ਨਾ ਸਿਰਫ਼ ਤੁਹਾਡੇ ਰੋਜ਼ਾਨਾ ਜੀਵਨ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਂਤੀ ਲਿਆਉਂਦਾ ਹੈ ਬਲਕਿ ਇਹ ਤੁਹਾਨੂੰ ਭਗਵਾਨ ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਦੇ ਨੇੜੇ ਲਿਆਉਣ ਵਿੱਚ ਵੀ ਮਦਦ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਪਵਿੱਤਰ ਪਾਠ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਜੀਵਨ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰਕੇ, ਤੁਸੀਂ ਅਦਭੁਤ ਅਧਿਆਤਮਿਕ ਅਤੇ ਭੌਤਿਕ ਲਾਭ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹੋ।

ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਸਹਸ੍ਰਨਾਮ ਸਤੋਤਰ ਦੇ ਅਦਭੁਤ ਲਾਭ, ਇਸਦੀ ਮਹੱਤਤਾ ਅਤੇ ਪਾਠ ਦੀ ਸਹੀ ਵਿਧੀ ਜਾਣੋ। ਪੜ੍ਹੋ ਅਤੇ ਸਮਝੋ ਕਿ ਇਹ ਪਵਿੱਤਰ ਪਾਠ ਤੁਹਾਡੇ ਜੀਵਨ ਵਿੱਚ ਸਕਾਰਾਤਮਕ ਤਬਦੀਲੀਆਂ ਕਿਵੇਂ ਲਿਆ ਸਕਦਾ ਹੈ।

ਵਿਸ਼ਨੂੰ ਸਹਸ੍ਰਨਾਮ ਸਟੋਤਰ ਪੰਜਾਬੀ PDF ਡਾਊਨਲੋਡ ਕਰੋ

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Vishnu Sahasranama Stotram
विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र
বিষ্ণু সহস্রনাম বাংলায়
વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ ગુજરાતીમાં
विष्णु मंत्र
Vishnu Mantra in English
आरती ओम जय जगदीश हरे
Om Jai Jagdish Hare Aarti In English

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्राचे चमत्कार: फायदे, महत्त्व आणि पठण पद्धत

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र हा हिंदू धर्मातील एक अत्यंत पवित्र आणि शक्तिशाली ग्रंथ मानला जातो, ज्यामध्ये भगवान विष्णूच्या हजार नावांचे वर्णन आहे. हे स्तोत्र केवळ भक्तांना ईश्वराच्या दैवी शक्तींशी जोडत नाही तर त्यांना जीवनातील समस्यांपासून मुक्त करण्यात मदत करते. त्याची पद्धत, फायदे आणि महत्त्व जाणून घेऊया.

Vishnu Sahasranama Marathi Lyrics

हरिः ॐ

विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ 1 ॥

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमागतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञो‌உक्षर एव च ॥ 2 ॥

योगो योगविदां नेता प्रधान पुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ 3 ॥

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ 4 ॥

स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ 5 ॥

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभो‌உमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ 6 ॥

अग्राह्यः शाश्वतो कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ 7 ॥

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ 8 ॥

ईश्वरो विक्रमीधन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान्॥ 9 ॥

सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहस्संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ 10 ॥

अजस्सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिस्सृतः ॥ 11 ॥

वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मा सम्मितस्समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ 12 ॥

रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।
अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥ 13 ॥

सर्वगः सर्व विद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित्कविः ॥ 14 ॥

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ 15 ॥

भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्नुर्जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ 16 ॥

उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः ।
अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ 17 ॥

वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ 18 ॥

महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ 19 ॥

महेश्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सताङ्गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ 20 ॥

मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ 21 ॥

अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ 22 ॥

गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषो‌உनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ 23 ॥

अग्रणीग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ 24 ॥

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ 25 ॥

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ 26 ॥

असङ्ख्येयो‌உप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धि साधनः ॥ 27 ॥

वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ 28 ॥

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ 29 ॥

ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्दः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ 30 ॥

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ 31 ॥

भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनो‌உनलः ।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ 32 ॥

युगादि कृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ 33 ॥

इष्टो‌உविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ 34 ॥

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ 35 ॥

स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्धरः ॥ 36 ॥

अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ 37 ॥

पद्मनाभो‌உरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् ।
महर्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥ 38 ॥

अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः ॥ 39 ॥

विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ 40 ॥

उद्भवः, क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ 41 ॥

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः ।
परर्धिः परमस्पष्टः तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ 42 ॥

रामो विरामो विरजो मार्गोनेयो नयो‌உनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मोधर्म विदुत्तमः ॥ 43 ॥

वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ 44 ॥

ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ 45 ॥

विस्तारः स्थावर स्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् ।
अर्थो‌உनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ 46 ॥

अनिर्विण्णः स्थविष्ठो भूद्धर्मयूपो महामखः ।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः, क्षामः समीहनः ॥ 47 ॥

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सताङ्गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ 48 ॥

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।
मनोहरो जितक्रोधो वीर बाहुर्विदारणः ॥ 49 ॥

स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत्। ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ 50 ॥

धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम्॥
अविज्ञाता सहस्त्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ 51 ॥

गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूत महेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ 52 ॥

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीर भूतभृद् भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ 53 ॥

सोमपो‌உमृतपः सोमः पुरुजित् पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वतां पतिः ॥ 54 ॥

जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दो‌உमित विक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधि शयोन्तकः ॥ 55 ॥

अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो‌உनन्दनोनन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ 56 ॥

महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ 57 ॥

महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्र गदाधरः ॥ 58 ॥

वेधाः स्वाङ्गो‌உजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणो‌உच्युतः ।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ 59 ॥

भगवान् भगहा‌உ‌உनन्दी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ 60 ॥

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिवःस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥ 61 ॥

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् ।
सन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम्। 62 ॥

शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ 63 ॥

अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः ॥ 64 ॥

श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमांल्लोकत्रयाश्रयः ॥ 65 ॥

स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः ।
विजितात्मा‌உविधेयात्मा सत्कीर्तिच्छिन्नसंशयः ॥ 66 ॥

उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥ 67 ॥

अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धो‌உप्रतिरथः प्रद्युम्नो‌உमितविक्रमः ॥ 68 ॥

कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥ 69 ॥

कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरो‌உनन्तो धनञ्जयः ॥ 70 ॥

ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥ 71 ॥

महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ 72 ॥

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ 73 ॥

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ 74 ॥

सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥ 75 ॥

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयो‌உनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरो‌உथापराजितः ॥ 76 ॥

विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥ 77 ॥

एको नैकः सवः कः किं यत्तत् पदमनुत्तमम् ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ 78 ॥

सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ 79 ॥

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ 80 ॥

तेजो‌உवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतांवरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ॥ 81 ॥

चतुर्मूर्ति श्चतुर्बाहु श्चतुर्व्यूह श्चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ 82 ॥

समावर्तो‌உनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥ 83 ॥

शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ 84 ॥

उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ 85 ॥

सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाहृदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ 86 ॥

कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनो‌உनिलः ।
अमृताशो‌உमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥ 87 ॥

सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
न्यग्रोधो‌உदुम्बरो‌உश्वत्थश्चाणूरान्ध्र निषूदनः ॥ 88 ॥

सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघो‌உचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥ 89 ॥

अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥ 90 ॥

भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः, क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ 91 ॥

धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ता‌உनियमो‌உयमः ॥ 92 ॥

सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्हो‌உर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ॥ 93 ॥

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ 94 ॥

अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजो‌உग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकधिष्ठानमद्भुतः ॥ 95 ॥

सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्तिः स्वस्तिभुक् स्वस्तिदक्षिणः ॥ 96 ॥

अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ 97 ॥

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः, क्षमिणांवरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ 98 ॥

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ 99 ॥

अनन्तरूपो‌உनन्त श्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।
चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ 100 ॥

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ 101 ॥

आधारनिलयो‌உधाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ 102 ॥

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत् प्राणजीवनः ।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ 103 ॥

भूर्भुवः स्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ 104 ॥

यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुक् यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ 105 ॥

आत्मयोनिः स्वयञ्जातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ 106 ॥

शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ 107 ॥

श्री सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ।

वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी ।
श्रीमान्नारायणो विष्णुर्वासुदेवो‌உभिरक्षतु ॥ 108 ॥

श्री वासुदेवो‌உभिरक्षतु ॐ नम इति ।

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्राचे महत्व

भगवान विष्णू हे जगाचे पालनकर्ते मानले जातात आणि त्यांच्या सहस्रनामाचे पठण केल्याने भक्तांना आध्यात्मिक शक्ती आणि मानसिक शांती मिळते. या स्तोत्राचे धार्मिक महत्त्व तर आहेच पण ते माणसाला नैतिक आणि भौतिक प्रगतीच्या दिशेनेही घेऊन जाते.

विष्णु सहस्रनामाचे पठण कसे करावे?

तयारी: आंघोळ करा, स्वच्छ कपडे घाला आणि प्रार्थनास्थळ स्वच्छ करा.
पूजास्थानाची सजावट: भगवान विष्णूच्या मूर्तीसमोर किंवा चित्रासमोर दिवा लावा आणि फुले अर्पण करा.
मंत्र जप: ‘विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र’ शांतपणे आणि काळजीपूर्वक पाठ करा. प्रत्येक नावाचा उच्चार स्पष्टपणे करा.
ध्यान: पाठानंतर काही वेळ ध्यानस्थ बसून भगवान विष्णूच्या दैवी गुणांचे चिंतन करा.

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्राचे फायदे

मानसिक शांती: नियमित पठण केल्याने मानसिक ताण आणि चिंता कमी होते.
आध्यात्मिक प्रगती: याच्या पठणाने आध्यात्मिक शक्ती वाढते आणि व्यक्ती आध्यात्मिकदृष्ट्या उन्नत होते.
संरक्षण आणि संरक्षण: असे मानले जाते की विष्णु सहस्रनामाचे पठण जीवनातील विविध अडथळे आणि नकारात्मक शक्तींपासून संरक्षण प्रदान करते.
भौतिक लाभ: त्याचे पठण केवळ आध्यात्मिकच नाही तर भौतिक लाभ देखील प्रदान करते.

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्राचे पठण केवळ तुमच्या दैनंदिन जीवनात शांती आणत नाही तर तुम्हाला भगवान विष्णूच्या जवळ आणण्यास देखील मदत करते. या पवित्र ग्रंथाचा आपल्या जीवनात समावेश करून, आपण आश्चर्यकारक आध्यात्मिक आणि भौतिक लाभ प्राप्त करू शकता.

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Vishnu Sahasranama Stotram
विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र
বিষ্ণু সহস্রনাম বাংলায়
વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ ગુજરાતીમાં
विष्णु मंत्र
Vishnu Mantra in English
आरती ओम जय जगदीश हरे
Om Jai Jagdish Hare Aarti In English
श्री सत्यनारायण व्रत कथा

Discover the Power of Vishnu Sahasranama Stotra: Benefits and Rituals

The Power of Vishnu Sahasranama Stotra

In the Hindu spiritual practices, the Vishnu Sahasranama Stotra stands out as a profound chant dedicated to Lord Vishnu, the protector and saviour of the universe. Comprising a thousand names of Vishnu, each verse of this stotra (hymn) holds the essence of His divine qualities and is a key to spiritual enlightenment and solace. Let’s explore into why and how to integrate the Vishnu Sahasranama Stotra into your spiritual routine, its benefits, and the associated rituals.

Why Recite the Vishnu Sahasranama Stotra?

  • Spiritual Clarity and Focus: Reciting the Vishnu Sahasranama can significantly enhance your mental clarity and focus. Each name of Vishnu invokes a specific quality or attribute of the deity, bringing closer association with those divine aspects.
  • Protection from Negative Forces: It is believed that regular chanting of the Vishnu Sahasranama provides protection against negative forces and influences, safeguarding the devotee’s life.
  • Karmic Balance: The stotra helps in rectifying various doshas (faults) in one’s horoscope, contributing to a pleasant and balanced life.

How to Recite the Vishnu Sahasranama Stotra?

  • Preparation: Choose a clean and quiet place, preferably in the morning. The mind should be calm and the body clean.
  • Setting an Platform: Place an idol or a picture of Lord Vishnu at your chosen place of worship. Light a lamp and some incense to create an auspicious atmosphere.
  • Starting Ritual: Begin with a simple prayer to Lord Vishnu, asking for his blessings to complete the stotra without any obstacles.
  • Chanting: Recite the stotra slowly and clearly. It’s important to pronounce each name properly to invoke the true essence of the deity’s attributes.
  • Closing Prayer: After completing the stotra, meditate for a few minutes, reflecting on the divine qualities of Lord Vishnu and seeking His blessings for you and your family.

Benefits of Reciting the Vishnu Sahasranama Stotra

  • Emotional Stability: Regular chanting of the stotra brings emotional balance and alleviates stress, promoting a sense of inner peace.
  • Spiritual Growth: The stotra is a powerful tool for spiritual growth, as it helps in developing a deeper connection with the divine.
  • Material Prosperity: It is also associated with attracting prosperity and success in life, as Lord Vishnu is the custodian of wealth and well-being.

Importance of Rituals in Vishnu Sahasranama

The rituals associated with the Vishnu Sahasranama Stotra amplify the spiritual benefits and aid in maintaining the sanctity and purity of the practice. They help the devotee stay disciplined and show respect and devotion towards Lord Vishnu, thereby improving the overall spiritual experience.

Conclusion
The Vishnu Sahasranama Stotra is not just a chant but a journey towards divine enlightenment. Its regular recitation is a testament to one’s devotion and a means to live a fulfilled life under the watchful eyes of Lord Vishnu. Whether you seek spiritual clarity, protection, or prosperity, the Vishnu Sahasranama can be your spiritual companion, guiding you through the vicissitudes of life.

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Vishnu Sahasranama Stotram
विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र
বিষ্ণু সহস্রনাম বাংলায়
વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ ગુજરાતીમાં
विष्णु मंत्र
Vishnu Mantra in English
आरती ओम जय जगदीश हरे
Om Jai Jagdish Hare Aarti In English

বিষ্ণু সহস্রনাম বাংলায় | Vishnu Sahasranama in Bangla

বিষ্ণু সহস্রনাম স্তোত্রের অলৌকিক ঘটনা: উপকারিতা, গুরুত্ব এবং আবৃত্তি পদ্ধতি

বিষ্ণু সহস্রনাম স্তোত্রকে হিন্দু ধর্মে একটি অত্যন্ত পবিত্র এবং শক্তিশালী পাঠ হিসাবে বিবেচনা করা হয়, যা ভগবান বিষ্ণুর হাজার নাম বর্ণনা করে। এই স্তোত্র শুধু ভক্তদের ভগবানের ঐশ্বরিক শক্তির সাথে সংযুক্ত করে না বরং তাদের জীবনের সমস্যা থেকে মুক্তি দিতেও সাহায্য করে। আসুন জেনে নেই এর পদ্ধতি, উপকারিতা ও গুরুত্ব সম্পর্কে।

Vishnu Sahasranama Bangla Lyrics

হরিঃ ওম্

বিশ্বং বিষ্ণুর্বষট্কারো ভূতভব্যভবত্প্রভুঃ |
ভূতকৃদ্ভূতভৃদ্ভাবো ভূতাত্মা ভূতভাবনঃ ‖ 1 ‖

পূতাত্মা পরমাত্মা চ মুক্তানাং পরমাগতিঃ |
অব্যযঃ পুরুষঃ সাক্ষী ক্ষেত্রজ্ঞোঽক্ষর এব চ ‖ 2 ‖

যোগো যোগবিদাং নেতা প্রধান পুরুষেশ্বরঃ |
নারসিংহবপুঃ শ্রীমান্ কেশবঃ পুরুষোত্তমঃ ‖ 3 ‖

সর্বঃ শর্বঃ শিবঃ স্থাণুর্ভূতাদির্নিধিরব্যযঃ |
সংভবো ভাবনো ভর্তা প্রভবঃ প্রভুরীশ্বরঃ ‖ 4 ‖

স্বযংভূঃ শংভুরাদিত্যঃ পুষ্করাক্ষো মহাস্বনঃ |
অনাদিনিধনো ধাতা বিধাতা ধাতুরুত্তমঃ ‖ 5 ‖

অপ্রমেযো হৃষীকেশঃ পদ্মনাভোঽমরপ্রভুঃ |
বিশ্বকর্মা মনুস্ত্বষ্টা স্থবিষ্ঠঃ স্থবিরো ধ্রুবঃ ‖ 6 ‖

অগ্রাহ্যঃ শাশ্বতো কৃষ্ণো লোহিতাক্ষঃ প্রতর্দনঃ |
প্রভূতস্ত্রিককুব্ধাম পবিত্রং মংগলং পরম্ ‖ 7 ‖

ঈশানঃ প্রাণদঃ প্রাণো জ্যেষ্ঠঃ শ্রেষ্ঠঃ প্রজাপতিঃ |
হিরণ্যগর্ভো ভূগর্ভো মাধবো মধুসূদনঃ ‖ 8 ‖

ঈশ্বরো বিক্রমীধন্বী মেধাবী বিক্রমঃ ক্রমঃ |
অনুত্তমো দুরাধর্ষঃ কৃতজ্ঞঃ কৃতিরাত্মবান্‖ 9 ‖

সুরেশঃ শরণং শর্ম বিশ্বরেতাঃ প্রজাভবঃ |
অহস্সংবত্সরো ব্যালঃ প্রত্যযঃ সর্বদর্শনঃ ‖ 10 ‖

অজস্সর্বেশ্বরঃ সিদ্ধঃ সিদ্ধিঃ সর্বাদিরচ্যুতঃ |
বৃষাকপিরমেযাত্মা সর্বযোগবিনিস্সৃতঃ ‖ 11 ‖

বসুর্বসুমনাঃ সত্যঃ সমাত্মা সম্মিতস্সমঃ |
অমোঘঃ পুংডরীকাক্ষো বৃষকর্মা বৃষাকৃতিঃ ‖ 12 ‖

রুদ্রো বহুশিরা বভ্রুর্বিশ্বযোনিঃ শুচিশ্রবাঃ |
অমৃতঃ শাশ্বতস্থাণুর্বরারোহো মহাতপাঃ ‖ 13 ‖

সর্বগঃ সর্ব বিদ্ভানুর্বিষ্বক্সেনো জনার্দনঃ |
বেদো বেদবিদব্যংগো বেদাংগো বেদবিত্কবিঃ ‖ 14 ‖

লোকাধ্যক্ষঃ সুরাধ্যক্ষো ধর্মাধ্যক্ষঃ কৃতাকৃতঃ |
চতুরাত্মা চতুর্ব্যূহশ্চতুর্দংষ্ট্রশ্চতুর্ভুজঃ ‖ 15 ‖

ভ্রাজিষ্ণুর্ভোজনং ভোক্তা সহিষ্নুর্জগদাদিজঃ |
অনঘো বিজযো জেতা বিশ্বযোনিঃ পুনর্বসুঃ ‖ 16 ‖

উপেংদ্রো বামনঃ প্রাংশুরমোঘঃ শুচিরূর্জিতঃ |
অতীংদ্রঃ সংগ্রহঃ সর্গো ধৃতাত্মা নিযমো যমঃ ‖ 17 ‖

বেদ্যো বৈদ্যঃ সদাযোগী বীরহা মাধবো মধুঃ |
অতীংদ্রিযো মহামাযো মহোত্সাহো মহাবলঃ ‖ 18 ‖

মহাবুদ্ধির্মহাবীর্যো মহাশক্তির্মহাদ্যুতিঃ |
অনির্দেশ্যবপুঃ শ্রীমানমেযাত্মা মহাদ্রিধৃক্ ‖ 19 ‖

মহেশ্বাসো মহীভর্তা শ্রীনিবাসঃ সতাংগতিঃ |
অনিরুদ্ধঃ সুরানংদো গোবিংদো গোবিদাং পতিঃ ‖ 20 ‖

মরীচির্দমনো হংসঃ সুপর্ণো ভুজগোত্তমঃ |
হিরণ্যনাভঃ সুতপাঃ পদ্মনাভঃ প্রজাপতিঃ ‖ 21 ‖

অমৃত্যুঃ সর্বদৃক্ সিংহঃ সংধাতা সংধিমান্ স্থিরঃ |
অজো দুর্মর্ষণঃ শাস্তা বিশ্রুতাত্মা সুরারিহা ‖ 22 ‖

গুরুর্গুরুতমো ধাম সত্যঃ সত্যপরাক্রমঃ |
নিমিষোঽনিমিষঃ স্রগ্বী বাচস্পতিরুদারধীঃ ‖ 23 ‖

অগ্রণীগ্রামণীঃ শ্রীমান্ ন্যাযো নেতা সমীরণঃ
সহস্রমূর্ধা বিশ্বাত্মা সহস্রাক্ষঃ সহস্রপাত্ ‖ 24 ‖

আবর্তনো নিবৃত্তাত্মা সংবৃতঃ সংপ্রমর্দনঃ |
অহঃ সংবর্তকো বহ্নিরনিলো ধরণীধরঃ ‖ 25 ‖

সুপ্রসাদঃ প্রসন্নাত্মা বিশ্বধৃগ্বিশ্বভুগ্বিভুঃ |
সত্কর্তা সত্কৃতঃ সাধুর্জহ্নুর্নারাযণো নরঃ ‖ 26 ‖

অসংখ্যেযোঽপ্রমেযাত্মা বিশিষ্টঃ শিষ্টকৃচ্ছুচিঃ |
সিদ্ধার্থঃ সিদ্ধসংকল্পঃ সিদ্ধিদঃ সিদ্ধি সাধনঃ ‖ 27 ‖

বৃষাহী বৃষভো বিষ্ণুর্বৃষপর্বা বৃষোদরঃ |
বর্ধনো বর্ধমানশ্চ বিবিক্তঃ শ্রুতিসাগরঃ ‖ 28 ‖

সুভুজো দুর্ধরো বাগ্মী মহেংদ্রো বসুদো বসুঃ |
নৈকরূপো বৃহদ্রূপঃ শিপিবিষ্টঃ প্রকাশনঃ ‖ 29 ‖

ওজস্তেজোদ্যুতিধরঃ প্রকাশাত্মা প্রতাপনঃ |
ঋদ্দঃ স্পষ্টাক্ষরো মংত্রশ্চংদ্রাংশুর্ভাস্করদ্যুতিঃ ‖ 30 ‖

অমৃতাংশূদ্ভবো ভানুঃ শশবিংদুঃ সুরেশ্বরঃ |
ঔষধং জগতঃ সেতুঃ সত্যধর্মপরাক্রমঃ ‖ 31 ‖

ভূতভব্যভবন্নাথঃ পবনঃ পাবনোঽনলঃ |
কামহা কামকৃত্কাংতঃ কামঃ কামপ্রদঃ প্রভুঃ ‖ 32 ‖

যুগাদি কৃদ্যুগাবর্তো নৈকমাযো মহাশনঃ |
অদৃশ্যো ব্যক্তরূপশ্চ সহস্রজিদনংতজিত্ ‖ 33 ‖

ইষ্টোঽবিশিষ্টঃ শিষ্টেষ্টঃ শিখংডী নহুষো বৃষঃ |
ক্রোধহা ক্রোধকৃত্কর্তা বিশ্ববাহুর্মহীধরঃ ‖ 34 ‖

অচ্যুতঃ প্রথিতঃ প্রাণঃ প্রাণদো বাসবানুজঃ |
অপাংনিধিরধিষ্ঠানমপ্রমত্তঃ প্রতিষ্ঠিতঃ ‖ 35 ‖

স্কংদঃ স্কংদধরো ধুর্যো বরদো বাযুবাহনঃ |
বাসুদেবো বৃহদ্ভানুরাদিদেবঃ পুরংধরঃ ‖ 36 ‖

অশোকস্তারণস্তারঃ শূরঃ শৌরির্জনেশ্বরঃ |
অনুকূলঃ শতাবর্তঃ পদ্মী পদ্মনিভেক্ষণঃ ‖ 37 ‖

পদ্মনাভোঽরবিংদাক্ষঃ পদ্মগর্ভঃ শরীরভৃত্ |
মহর্ধিরৃদ্ধো বৃদ্ধাত্মা মহাক্ষো গরুডধ্বজঃ ‖ 38 ‖

অতুলঃ শরভো ভীমঃ সমযজ্ঞো হবির্হরিঃ |
সর্বলক্ষণলক্ষণ্যো লক্ষ্মীবান্ সমিতিংজযঃ ‖ 39 ‖

বিক্ষরো রোহিতো মার্গো হেতুর্দামোদরঃ সহঃ |
মহীধরো মহাভাগো বেগবানমিতাশনঃ ‖ 40 ‖

উদ্ভবঃ, ক্ষোভণো দেবঃ শ্রীগর্ভঃ পরমেশ্বরঃ |
করণং কারণং কর্তা বিকর্তা গহনো গুহঃ ‖ 41 ‖

ব্যবসাযো ব্যবস্থানঃ সংস্থানঃ স্থানদো ধ্রুবঃ |
পরর্ধিঃ পরমস্পষ্টঃ তুষ্টঃ পুষ্টঃ শুভেক্ষণঃ ‖ 42 ‖

রামো বিরামো বিরজো মার্গোনেযো নযোঽনযঃ |
বীরঃ শক্তিমতাং শ্রেষ্ঠো ধর্মোধর্ম বিদুত্তমঃ ‖ 43 ‖

বৈকুংঠঃ পুরুষঃ প্রাণঃ প্রাণদঃ প্রণবঃ পৃথুঃ |
হিরণ্যগর্ভঃ শত্রুঘ্নো ব্যাপ্তো বাযুরধোক্ষজঃ ‖ 44 ‖

ঋতুঃ সুদর্শনঃ কালঃ পরমেষ্ঠী পরিগ্রহঃ |
উগ্রঃ সংবত্সরো দক্ষো বিশ্রামো বিশ্বদক্ষিণঃ ‖ 45 ‖

বিস্তারঃ স্থাবর স্থাণুঃ প্রমাণং বীজমব্যযং |
অর্থোঽনর্থো মহাকোশো মহাভোগো মহাধনঃ ‖ 46 ‖

অনির্বিণ্ণঃ স্থবিষ্ঠো ভূদ্ধর্মযূপো মহামখঃ |
নক্ষত্রনেমির্নক্ষত্রী ক্ষমঃ, ক্ষামঃ সমীহনঃ ‖ 47 ‖

যজ্ঞ ইজ্যো মহেজ্যশ্চ ক্রতুঃ সত্রং সতাংগতিঃ |
সর্বদর্শী বিমুক্তাত্মা সর্বজ্ঞো জ্ঞানমুত্তমং ‖ 48 ‖

সুব্রতঃ সুমুখঃ সূক্ষ্মঃ সুঘোষঃ সুখদঃ সুহৃত্ |
মনোহরো জিতক্রোধো বীর বাহুর্বিদারণঃ ‖ 49 ‖

স্বাপনঃ স্ববশো ব্যাপী নৈকাত্মা নৈককর্মকৃত্| |
বত্সরো বত্সলো বত্সী রত্নগর্ভো ধনেশ্বরঃ ‖ 50 ‖

ধর্মগুব্ধর্মকৃদ্ধর্মী সদসত্ক্ষরমক্ষরম্‖
অবিজ্ঞাতা সহস্ত্রাংশুর্বিধাতা কৃতলক্ষণঃ ‖ 51 ‖

গভস্তিনেমিঃ সত্ত্বস্থঃ সিংহো ভূত মহেশ্বরঃ |
আদিদেবো মহাদেবো দেবেশো দেবভৃদ্গুরুঃ ‖ 52 ‖

উত্তরো গোপতির্গোপ্তা জ্ঞানগম্যঃ পুরাতনঃ |
শরীর ভূতভৃদ্ ভোক্তা কপীংদ্রো ভূরিদক্ষিণঃ ‖ 53 ‖

সোমপোঽমৃতপঃ সোমঃ পুরুজিত্ পুরুসত্তমঃ |
বিনযো জযঃ সত্যসংধো দাশার্হঃ সাত্বতাং পতিঃ ‖ 54 ‖

জীবো বিনযিতা সাক্ষী মুকুংদোঽমিত বিক্রমঃ |
অংভোনিধিরনংতাত্মা মহোদধি শযোংতকঃ ‖ 55 ‖

অজো মহার্হঃ স্বাভাব্যো জিতামিত্রঃ প্রমোদনঃ |
আনংদোঽনংদনোনংদঃ সত্যধর্মা ত্রিবিক্রমঃ ‖ 56 ‖

মহর্ষিঃ কপিলাচার্যঃ কৃতজ্ঞো মেদিনীপতিঃ |
ত্রিপদস্ত্রিদশাধ্যক্ষো মহাশৃংগঃ কৃতাংতকৃত্ ‖ 57 ‖

মহাবরাহো গোবিংদঃ সুষেণঃ কনকাংগদী |
গুহ্যো গভীরো গহনো গুপ্তশ্চক্র গদাধরঃ ‖ 58 ‖

বেধাঃ স্বাংগোঽজিতঃ কৃষ্ণো দৃঢঃ সংকর্ষণোঽচ্যুতঃ |
বরুণো বারুণো বৃক্ষঃ পুষ্করাক্ষো মহামনাঃ ‖ 59 ‖

ভগবান্ ভগহাঽঽনংদী বনমালী হলাযুধঃ |
আদিত্যো জ্যোতিরাদিত্যঃ সহিষ্ণুর্গতিসত্তমঃ ‖ 60 ‖

সুধন্বা খংডপরশুর্দারুণো দ্রবিণপ্রদঃ |
দিবঃস্পৃক্ সর্বদৃগ্ব্যাসো বাচস্পতিরযোনিজঃ ‖ 61 ‖

ত্রিসামা সামগঃ সাম নির্বাণং ভেষজং ভিষক্ |
সন্যাসকৃচ্ছমঃ শাংতো নিষ্ঠা শাংতিঃ পরাযণম্| 62 ‖

শুভাংগঃ শাংতিদঃ স্রষ্টা কুমুদঃ কুবলেশযঃ |
গোহিতো গোপতির্গোপ্তা বৃষভাক্ষো বৃষপ্রিযঃ ‖ 63 ‖

অনিবর্তী নিবৃত্তাত্মা সংক্ষেপ্তা ক্ষেমকৃচ্ছিবঃ |
শ্রীবত্সবক্ষাঃ শ্রীবাসঃ শ্রীপতিঃ শ্রীমতাংবরঃ ‖ 64 ‖

শ্রীদঃ শ্রীশঃ শ্রীনিবাসঃ শ্রীনিধিঃ শ্রীবিভাবনঃ |
শ্রীধরঃ শ্রীকরঃ শ্রেযঃ শ্রীমাংল্লোকত্রযাশ্রযঃ ‖ 65 ‖

স্বক্ষঃ স্বংগঃ শতানংদো নংদির্জ্যোতির্গণেশ্বরঃ |
বিজিতাত্মাঽবিধেযাত্মা সত্কীর্তিচ্ছিন্নসংশযঃ ‖ 66 ‖

উদীর্ণঃ সর্বতশ্চক্ষুরনীশঃ শাশ্বতস্থিরঃ |
ভূশযো ভূষণো ভূতির্বিশোকঃ শোকনাশনঃ ‖ 67 ‖

অর্চিষ্মানর্চিতঃ কুংভো বিশুদ্ধাত্মা বিশোধনঃ |
অনিরুদ্ধোঽপ্রতিরথঃ প্রদ্যুম্নোঽমিতবিক্রমঃ ‖ 68 ‖

কালনেমিনিহা বীরঃ শৌরিঃ শূরজনেশ্বরঃ |
ত্রিলোকাত্মা ত্রিলোকেশঃ কেশবঃ কেশিহা হরিঃ ‖ 69 ‖

কামদেবঃ কামপালঃ কামী কাংতঃ কৃতাগমঃ |
অনির্দেশ্যবপুর্বিষ্ণুর্বীরোঽনংতো ধনংজযঃ ‖ 70 ‖

ব্রহ্মণ্যো ব্রহ্মকৃদ্ ব্রহ্মা ব্রহ্ম ব্রহ্মবিবর্ধনঃ |
ব্রহ্মবিদ্ ব্রাহ্মণো ব্রহ্মী ব্রহ্মজ্ঞো ব্রাহ্মণপ্রিযঃ ‖ 71 ‖

মহাক্রমো মহাকর্মা মহাতেজা মহোরগঃ |
মহাক্রতুর্মহাযজ্বা মহাযজ্ঞো মহাহবিঃ ‖ 72 ‖

স্তব্যঃ স্তবপ্রিযঃ স্তোত্রং স্তুতিঃ স্তোতা রণপ্রিযঃ |
পূর্ণঃ পূরযিতা পুণ্যঃ পুণ্যকীর্তিরনামযঃ ‖ 73 ‖

মনোজবস্তীর্থকরো বসুরেতা বসুপ্রদঃ |
বসুপ্রদো বাসুদেবো বসুর্বসুমনা হবিঃ ‖ 74 ‖

সদ্গতিঃ সত্কৃতিঃ সত্তা সদ্ভূতিঃ সত্পরাযণঃ |
শূরসেনো যদুশ্রেষ্ঠঃ সন্নিবাসঃ সুযামুনঃ ‖ 75 ‖

ভূতাবাসো বাসুদেবঃ সর্বাসুনিলযোঽনলঃ |
দর্পহা দর্পদো দৃপ্তো দুর্ধরোঽথাপরাজিতঃ ‖ 76 ‖

বিশ্বমূর্তির্মহামূর্তির্দীপ্তমূর্তিরমূর্তিমান্ |
অনেকমূর্তিরব্যক্তঃ শতমূর্তিঃ শতাননঃ ‖ 77 ‖

একো নৈকঃ সবঃ কঃ কিং যত্তত্ পদমনুত্তমং |
লোকবংধুর্লোকনাথো মাধবো ভক্তবত্সলঃ ‖ 78 ‖

সুবর্ণবর্ণো হেমাংগো বরাংগশ্চংদনাংগদী |
বীরহা বিষমঃ শূন্যো ঘৃতাশীরচলশ্চলঃ ‖ 79 ‖

অমানী মানদো মান্যো লোকস্বামী ত্রিলোকধৃক্ |
সুমেধা মেধজো ধন্যঃ সত্যমেধা ধরাধরঃ ‖ 80 ‖

তেজোঽবৃষো দ্যুতিধরঃ সর্বশস্ত্রভৃতাংবরঃ |
প্রগ্রহো নিগ্রহো ব্যগ্রো নৈকশৃংগো গদাগ্রজঃ ‖ 81 ‖

চতুর্মূর্তি শ্চতুর্বাহু শ্চতুর্ব্যূহ শ্চতুর্গতিঃ |
চতুরাত্মা চতুর্ভাবশ্চতুর্বেদবিদেকপাত্ ‖ 82 ‖

সমাবর্তোঽনিবৃত্তাত্মা দুর্জযো দুরতিক্রমঃ |
দুর্লভো দুর্গমো দুর্গো দুরাবাসো দুরারিহা ‖ 83 ‖

শুভাংগো লোকসারংগঃ সুতংতুস্তংতুবর্ধনঃ |
ইংদ্রকর্মা মহাকর্মা কৃতকর্মা কৃতাগমঃ ‖ 84 ‖

উদ্ভবঃ সুংদরঃ সুংদো রত্ননাভঃ সুলোচনঃ |
অর্কো বাজসনঃ শৃংগী জযংতঃ সর্ববিজ্জযী ‖ 85 ‖

সুবর্ণবিংদুরক্ষোভ্যঃ সর্ববাগীশ্বরেশ্বরঃ |
মহাহৃদো মহাগর্তো মহাভূতো মহানিধিঃ ‖ 86 ‖

কুমুদঃ কুংদরঃ কুংদঃ পর্জন্যঃ পাবনোঽনিলঃ |
অমৃতাশোঽমৃতবপুঃ সর্বজ্ঞঃ সর্বতোমুখঃ ‖ 87 ‖

সুলভঃ সুব্রতঃ সিদ্ধঃ শত্রুজিচ্ছত্রুতাপনঃ |
ন্যগ্রোধোঽদুংবরোঽশ্বত্থশ্চাণূরাংধ্র নিষূদনঃ ‖ 88 ‖

সহস্রার্চিঃ সপ্তজিহ্বঃ সপ্তৈধাঃ সপ্তবাহনঃ |
অমূর্তিরনঘোঽচিংত্যো ভযকৃদ্ভযনাশনঃ ‖ 89 ‖

অণুর্বৃহত্কৃশঃ স্থূলো গুণভৃন্নির্গুণো মহান্ |
অধৃতঃ স্বধৃতঃ স্বাস্যঃ প্রাগ্বংশো বংশবর্ধনঃ ‖ 90 ‖

ভারভৃত্ কথিতো যোগী যোগীশঃ সর্বকামদঃ |
আশ্রমঃ শ্রমণঃ, ক্ষামঃ সুপর্ণো বাযুবাহনঃ ‖ 91 ‖

ধনুর্ধরো ধনুর্বেদো দংডো দমযিতা দমঃ |
অপরাজিতঃ সর্বসহো নিযংতাঽনিযমোঽযমঃ ‖ 92 ‖

সত্ত্ববান্ সাত্ত্বিকঃ সত্যঃ সত্যধর্মপরাযণঃ |
অভিপ্রাযঃ প্রিযার্হোঽর্হঃ প্রিযকৃত্ প্রীতিবর্ধনঃ ‖ 93 ‖

বিহাযসগতির্জ্যোতিঃ সুরুচির্হুতভুগ্বিভুঃ |
রবির্বিরোচনঃ সূর্যঃ সবিতা রবিলোচনঃ ‖ 94 ‖

অনংতো হুতভুগ্ভোক্তা সুখদো নৈকজোঽগ্রজঃ |
অনির্বিণ্ণঃ সদামর্ষী লোকধিষ্ঠানমদ্ভুতঃ ‖ 95 ‖

সনাত্সনাতনতমঃ কপিলঃ কপিরব্যযঃ |
স্বস্তিদঃ স্বস্তিকৃত্স্বস্তিঃ স্বস্তিভুক্ স্বস্তিদক্ষিণঃ ‖ 96 ‖

অরৌদ্রঃ কুংডলী চক্রী বিক্রম্যূর্জিতশাসনঃ |
শব্দাতিগঃ শব্দসহঃ শিশিরঃ শর্বরীকরঃ ‖ 97 ‖

অক্রূরঃ পেশলো দক্ষো দক্ষিণঃ, ক্ষমিণাংবরঃ |
বিদ্বত্তমো বীতভযঃ পুণ্যশ্রবণকীর্তনঃ ‖ 98 ‖

উত্তারণো দুষ্কৃতিহা পুণ্যো দুঃস্বপ্ননাশনঃ |
বীরহা রক্ষণঃ সংতো জীবনঃ পর্যবস্থিতঃ ‖ 99 ‖

অনংতরূপোঽনংত শ্রীর্জিতমন্যুর্ভযাপহঃ |
চতুরশ্রো গভীরাত্মা বিদিশো ব্যাদিশো দিশঃ ‖ 100 ‖

অনাদির্ভূর্ভুবো লক্ষ্মীঃ সুবীরো রুচিরাংগদঃ |
জননো জনজন্মাদির্ভীমো ভীমপরাক্রমঃ ‖ 101 ‖

আধারনিলযোঽধাতা পুষ্পহাসঃ প্রজাগরঃ |
ঊর্ধ্বগঃ সত্পথাচারঃ প্রাণদঃ প্রণবঃ পণঃ ‖ 102 ‖

প্রমাণং প্রাণনিলযঃ প্রাণভৃত্ প্রাণজীবনঃ |
তত্ত্বং তত্ত্ববিদেকাত্মা জন্মমৃত্যুজরাতিগঃ ‖ 103 ‖

ভূর্ভুবঃ স্বস্তরুস্তারঃ সবিতা প্রপিতামহঃ |
যজ্ঞো যজ্ঞপতির্যজ্বা যজ্ঞাংগো যজ্ঞবাহনঃ ‖ 104 ‖

যজ্ঞভৃদ্ যজ্ঞকৃদ্ যজ্ঞী যজ্ঞভুক্ যজ্ঞসাধনঃ |
যজ্ঞাংতকৃদ্ যজ্ঞগুহ্যমন্নমন্নাদ এব চ ‖ 105 ‖

আত্মযোনিঃ স্বযংজাতো বৈখানঃ সামগাযনঃ |
দেবকীনংদনঃ স্রষ্টা ক্ষিতীশঃ পাপনাশনঃ ‖ 106 ‖

শংখভৃন্নংদকী চক্রী শারংগধন্বা গদাধরঃ |
রথাংগপাণিরক্ষোভ্যঃ সর্বপ্রহরণাযুধঃ ‖ 107 ‖

শ্রী সর্বপ্রহরণাযুধ ওং নম ইতি |

বনমালী গদী শারংগী শংখী চক্রী চ নংদকী |
শ্রীমান্নারাযণো বিষ্ণুর্বাসুদেবোঽভিরক্ষতু ‖ 108 ‖

শ্রী বাসুদেবোঽভিরক্ষতু ওং নম ইতি |

বিষ্ণু সহস্রনাম স্তোত্রের গুরুত্ব

ভগবান বিষ্ণুকে বিশ্বের ধারক হিসাবে বিবেচনা করা হয় এবং তাঁর সহস্রনাম পাঠ করা ভক্তদের আধ্যাত্মিক শক্তি এবং মানসিক শান্তি দেয়। এই স্তোত্রের শুধু ধর্মীয় গুরুত্বই নেই, এটি একজন মানুষকে নৈতিক ও বৈষয়িক উন্নতির দিকেও নিয়ে যায়।

বিষ্ণু সহস্রনাম কিভাবে পাঠ করবেন?

প্রস্তুতি: স্নান করুন, পরিষ্কার কাপড় পরিধান করুন এবং পূজার স্থান পরিষ্কার করুন।
উপাসনা স্থানের অলংকরণ: প্রদীপ জ্বালান এবং ভগবান বিষ্ণুর মূর্তি বা ছবির সামনে ফুল অর্পণ করুন।
মন্ত্র জপ: শান্তভাবে এবং সাবধানে ‘বিষ্ণু সহস্রনাম স্তোত্র’ পাঠ করুন। প্রতিটি নাম স্পষ্টভাবে উচ্চারণ করুন।
ধ্যান: পাঠের পরে, কিছুক্ষণ ধ্যানে বসুন এবং ভগবান বিষ্ণুর ঐশ্বরিক গুণাবলী নিয়ে চিন্তা করুন।

বিষ্ণু সহস্রনাম স্তোত্রের উপকারিতা

মানসিক শান্তি: নিয়মিত তেলাওয়াত মানসিক চাপ ও দুশ্চিন্তা কমায়।
আধ্যাত্মিক উন্নতি: এর আবৃত্তি আধ্যাত্মিক শক্তি বৃদ্ধি করে এবং ব্যক্তি আধ্যাত্মিকভাবে উন্নত হয়।
সুরক্ষা এবং সুরক্ষা: এটি বিশ্বাস করা হয় যে বিষ্ণু সহস্রনাম পাঠ জীবনের বিভিন্ন বাধা এবং নেতিবাচক শক্তি থেকে সুরক্ষা প্রদান করে।
বস্তুগত উপকারিতা: এর আবৃত্তি শুধুমাত্র আধ্যাত্মিক নয়, বস্তুগত উপকারও দেয়।

বিষ্ণু সহস্রনাম স্তোত্রের পাঠ শুধুমাত্র আপনার দৈনন্দিন জীবনে শান্তি আনে না কিন্তু এটি আপনাকে ভগবান বিষ্ণুর কাছাকাছি আনতেও সাহায্য করে। এই পবিত্র পাঠটি আপনার জীবনে অন্তর্ভুক্ত করে, আপনি আশ্চর্যজনক আধ্যাত্মিক এবং বস্তুগত সুবিধা পেতে পারেন।

বিষ্ণু সহস্রনাম স্তোত্র, বিষ্ণু পূজা পদ্ধতি, বিষ্ণু সহস্রনামের উপকারিতা, হিন্দু ধর্মীয় আবৃত্তি, বিষ্ণু স্তোত্রের গুরুত্ব, বিষ্ণু ভক্তি পদ্ধতি, বিষ্ণু সহস্রনাম কীভাবে পাঠ করবেন, আধ্যাত্মিক বিকাশের উপায়

বিষ্ণু সহস্রনামা স্টোত্র বেনিফিট

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Vishnu Sahasranama Stotram
विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र
বিষ্ণু সহস্রনাম বাংলায়
વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ ગુજરાતીમાં
विष्णु मंत्र
Vishnu Mantra in English
आरती ओम जय जगदीश हरे
Om Jai Jagdish Hare Aarti In English
শ্রী সত্যনারায়ণ ব্রত কথা

વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ ગુજરાતીમાં | Vishnu Sahasranamam in gujarati

વિષ્ણુ સહસ્રનામ સ્તોત્રના ચમત્કારો: લાભ, મહત્વ અને પાઠ પદ્ધતિ

વિષ્ણુ સહસ્રનામ સ્તોત્રને હિન્દુ ધર્મમાં અત્યંત પવિત્ર અને શક્તિશાળી ગ્રંથ માનવામાં આવે છે, જે ભગવાન વિષ્ણુના હજાર નામોનું વર્ણન કરે છે. આ સ્તોત્ર ભક્તોને ભગવાનની દૈવી શક્તિઓ સાથે જોડે છે એટલું જ નહીં પણ જીવનની સમસ્યાઓમાંથી મુક્તિ અપાવવામાં પણ મદદ કરે છે. ચાલો જાણીએ તેની પદ્ધતિ, ફાયદા અને મહત્વ વિશે.

Vishnu Sahasranamam Gujarati lyrics

વિશ્વં વિષ્ણુર્વષટ્કારો ભૂતભવ્યભવત્પ્રભુઃ |
ભૂતકૃદ્ભૂતભૃદ્ભાવો ભૂતાત્મા ભૂતભાવનઃ ‖ 1 ‖

પૂતાત્મા પરમાત્મા ચ મુક્તાનાં પરમાગતિઃ |
અવ્યયઃ પુરુષઃ સાક્ષી ક્ષેત્રજ્ઞોઽક્ષર એવ ચ ‖ 2 ‖

યોગો યોગવિદાં નેતા પ્રધાન પુરુષેશ્વરઃ |
નારસિંહવપુઃ શ્રીમાન્ કેશવઃ પુરુષોત્તમઃ ‖ 3 ‖

સર્વઃ શર્વઃ શિવઃ સ્થાણુર્ભૂતાદિર્નિધિરવ્યયઃ |
સંભવો ભાવનો ભર્તા પ્રભવઃ પ્રભુરીશ્વરઃ ‖ 4 ‖

સ્વયંભૂઃ શંભુરાદિત્યઃ પુષ્કરાક્ષો મહાસ્વનઃ |
અનાદિનિધનો ધાતા વિધાતા ધાતુરુત્તમઃ ‖ 5 ‖

અપ્રમેયો હૃષીકેશઃ પદ્મનાભોઽમરપ્રભુઃ |
વિશ્વકર્મા મનુસ્ત્વષ્ટા સ્થવિષ્ઠઃ સ્થવિરો ધ્રુવઃ ‖ 6 ‖

અગ્રાહ્યઃ શાશ્વતો કૃષ્ણો લોહિતાક્ષઃ પ્રતર્દનઃ |
પ્રભૂતસ્ત્રિકકુબ્ધામ પવિત્રં મંગળં પરમ્ ‖ 7 ‖

ઈશાનઃ પ્રાણદઃ પ્રાણો જ્યેષ્ઠઃ શ્રેષ્ઠઃ પ્રજાપતિઃ |
હિરણ્યગર્ભો ભૂગર્ભો માધવો મધુસૂદનઃ ‖ 8 ‖

ઈશ્વરો વિક્રમીધન્વી મેધાવી વિક્રમઃ ક્રમઃ |
અનુત્તમો દુરાધર્ષઃ કૃતજ્ઞઃ કૃતિરાત્મવાન્‖ 9 ‖

સુરેશઃ શરણં શર્મ વિશ્વરેતાઃ પ્રજાભવઃ |
અહસ્સંવત્સરો વ્યાળઃ પ્રત્યયઃ સર્વદર્શનઃ ‖ 10 ‖

અજસ્સર્વેશ્વરઃ સિદ્ધઃ સિદ્ધિઃ સર્વાદિરચ્યુતઃ |
વૃષાકપિરમેયાત્મા સર્વયોગવિનિસ્સૃતઃ ‖ 11 ‖

વસુર્વસુમનાઃ સત્યઃ સમાત્મા સમ્મિતસ્સમઃ |
અમોઘઃ પુંડરીકાક્ષો વૃષકર્મા વૃષાકૃતિઃ ‖ 12 ‖

રુદ્રો બહુશિરા બભ્રુર્વિશ્વયોનિઃ શુચિશ્રવાઃ |
અમૃતઃ શાશ્વતસ્થાણુર્વરારોહો મહાતપાઃ ‖ 13 ‖

સર્વગઃ સર્વ વિદ્ભાનુર્વિષ્વક્સેનો જનાર્દનઃ |
વેદો વેદવિદવ્યંગો વેદાંગો વેદવિત્કવિઃ ‖ 14 ‖

લોકાધ્યક્ષઃ સુરાધ્યક્ષો ધર્માધ્યક્ષઃ કૃતાકૃતઃ |
ચતુરાત્મા ચતુર્વ્યૂહશ્ચતુર્દંષ્ટ્રશ્ચતુર્ભુજઃ ‖ 15 ‖

ભ્રાજિષ્ણુર્ભોજનં ભોક્તા સહિષ્નુર્જગદાદિજઃ |
અનઘો વિજયો જેતા વિશ્વયોનિઃ પુનર્વસુઃ ‖ 16 ‖

ઉપેંદ્રો વામનઃ પ્રાંશુરમોઘઃ શુચિરૂર્જિતઃ |
અતીંદ્રઃ સંગ્રહઃ સર્ગો ધૃતાત્મા નિયમો યમઃ ‖ 17 ‖

વેદ્યો વૈદ્યઃ સદાયોગી વીરહા માધવો મધુઃ |
અતીંદ્રિયો મહામાયો મહોત્સાહો મહાબલઃ ‖ 18 ‖

મહાબુદ્ધિર્મહાવીર્યો મહાશક્તિર્મહાદ્યુતિઃ |
અનિર્દેશ્યવપુઃ શ્રીમાનમેયાત્મા મહાદ્રિધૃક્ ‖ 19 ‖

મહેશ્વાસો મહીભર્તા શ્રીનિવાસઃ સતાંગતિઃ |
અનિરુદ્ધઃ સુરાનંદો ગોવિંદો ગોવિદાં પતિઃ ‖ 20 ‖

મરીચિર્દમનો હંસઃ સુપર્ણો ભુજગોત્તમઃ |
હિરણ્યનાભઃ સુતપાઃ પદ્મનાભઃ પ્રજાપતિઃ ‖ 21 ‖

અમૃત્યુઃ સર્વદૃક્ સિંહઃ સંધાતા સંધિમાન્ સ્થિરઃ |
અજો દુર્મર્ષણઃ શાસ્તા વિશ્રુતાત્મા સુરારિહા ‖ 22 ‖

ગુરુર્ગુરુતમો ધામ સત્યઃ સત્યપરાક્રમઃ |
નિમિષોઽનિમિષઃ સ્રગ્વી વાચસ્પતિરુદારધીઃ ‖ 23 ‖

અગ્રણીગ્રામણીઃ શ્રીમાન્ ન્યાયો નેતા સમીરણઃ
સહસ્રમૂર્ધા વિશ્વાત્મા સહસ્રાક્ષઃ સહસ્રપાત્ ‖ 24 ‖

આવર્તનો નિવૃત્તાત્મા સંવૃતઃ સંપ્રમર્દનઃ |
અહઃ સંવર્તકો વહ્નિરનિલો ધરણીધરઃ ‖ 25 ‖

સુપ્રસાદઃ પ્રસન્નાત્મા વિશ્વધૃગ્વિશ્વભુગ્વિભુઃ |
સત્કર્તા સત્કૃતઃ સાધુર્જહ્નુર્નારાયણો નરઃ ‖ 26 ‖

અસંખ્યેયોઽપ્રમેયાત્મા વિશિષ્ટઃ શિષ્ટકૃચ્છુચિઃ |
સિદ્ધાર્થઃ સિદ્ધસંકલ્પઃ સિદ્ધિદઃ સિદ્ધિ સાધનઃ ‖ 27 ‖

વૃષાહી વૃષભો વિષ્ણુર્વૃષપર્વા વૃષોદરઃ |
વર્ધનો વર્ધમાનશ્ચ વિવિક્તઃ શ્રુતિસાગરઃ ‖ 28 ‖

સુભુજો દુર્ધરો વાગ્મી મહેંદ્રો વસુદો વસુઃ |
નૈકરૂપો બૃહદ્રૂપઃ શિપિવિષ્ટઃ પ્રકાશનઃ ‖ 29 ‖

ઓજસ્તેજોદ્યુતિધરઃ પ્રકાશાત્મા પ્રતાપનઃ |
ઋદ્દઃ સ્પષ્ટાક્ષરો મંત્રશ્ચંદ્રાંશુર્ભાસ્કરદ્યુતિઃ ‖ 30 ‖

અમૃતાંશૂદ્ભવો ભાનુઃ શશબિંદુઃ સુરેશ્વરઃ |
ઔષધં જગતઃ સેતુઃ સત્યધર્મપરાક્રમઃ ‖ 31 ‖

ભૂતભવ્યભવન્નાથઃ પવનઃ પાવનોઽનલઃ |
કામહા કામકૃત્કાંતઃ કામઃ કામપ્રદઃ પ્રભુઃ ‖ 32 ‖

યુગાદિ કૃદ્યુગાવર્તો નૈકમાયો મહાશનઃ |
અદૃશ્યો વ્યક્તરૂપશ્ચ સહસ્રજિદનંતજિત્ ‖ 33 ‖

ઇષ્ટોઽવિશિષ્ટઃ શિષ્ટેષ્ટઃ શિખંડી નહુષો વૃષઃ |
ક્રોધહા ક્રોધકૃત્કર્તા વિશ્વબાહુર્મહીધરઃ ‖ 34 ‖

અચ્યુતઃ પ્રથિતઃ પ્રાણઃ પ્રાણદો વાસવાનુજઃ |
અપાંનિધિરધિષ્ઠાનમપ્રમત્તઃ પ્રતિષ્ઠિતઃ ‖ 35 ‖

સ્કંદઃ સ્કંદધરો ધુર્યો વરદો વાયુવાહનઃ |
વાસુદેવો બૃહદ્ભાનુરાદિદેવઃ પુરંધરઃ ‖ 36 ‖

અશોકસ્તારણસ્તારઃ શૂરઃ શૌરિર્જનેશ્વરઃ |
અનુકૂલઃ શતાવર્તઃ પદ્મી પદ્મનિભેક્ષણઃ ‖ 37 ‖

પદ્મનાભોઽરવિંદાક્ષઃ પદ્મગર્ભઃ શરીરભૃત્ |
મહર્ધિરૃદ્ધો વૃદ્ધાત્મા મહાક્ષો ગરુડધ્વજઃ ‖ 38 ‖

અતુલઃ શરભો ભીમઃ સમયજ્ઞો હવિર્હરિઃ |
સર્વલક્ષણલક્ષણ્યો લક્ષ્મીવાન્ સમિતિંજયઃ ‖ 39 ‖

વિક્ષરો રોહિતો માર્ગો હેતુર્દામોદરઃ સહઃ |
મહીધરો મહાભાગો વેગવાનમિતાશનઃ ‖ 40 ‖

ઉદ્ભવઃ, ક્ષોભણો દેવઃ શ્રીગર્ભઃ પરમેશ્વરઃ |
કરણં કારણં કર્તા વિકર્તા ગહનો ગુહઃ ‖ 41 ‖

વ્યવસાયો વ્યવસ્થાનઃ સંસ્થાનઃ સ્થાનદો ધ્રુવઃ |
પરર્ધિઃ પરમસ્પષ્ટઃ તુષ્ટઃ પુષ્ટઃ શુભેક્ષણઃ ‖ 42 ‖

રામો વિરામો વિરજો માર્ગોનેયો નયોઽનયઃ |
વીરઃ શક્તિમતાં શ્રેષ્ઠો ધર્મોધર્મ વિદુત્તમઃ ‖ 43 ‖

વૈકુંઠઃ પુરુષઃ પ્રાણઃ પ્રાણદઃ પ્રણવઃ પૃથુઃ |
હિરણ્યગર્ભઃ શત્રુઘ્નો વ્યાપ્તો વાયુરધોક્ષજઃ ‖ 44 ‖

ઋતુઃ સુદર્શનઃ કાલઃ પરમેષ્ઠી પરિગ્રહઃ |
ઉગ્રઃ સંવત્સરો દક્ષો વિશ્રામો વિશ્વદક્ષિણઃ ‖ 45 ‖

વિસ્તારઃ સ્થાવર સ્થાણુઃ પ્રમાણં બીજમવ્યયં |
અર્થોઽનર્થો મહાકોશો મહાભોગો મહાધનઃ ‖ 46 ‖

અનિર્વિણ્ણઃ સ્થવિષ્ઠો ભૂદ્ધર્મયૂપો મહામખઃ |
નક્ષત્રનેમિર્નક્ષત્રી ક્ષમઃ, ક્ષામઃ સમીહનઃ ‖ 47 ‖

યજ્ઞ ઇજ્યો મહેજ્યશ્ચ ક્રતુઃ સત્રં સતાંગતિઃ |
સર્વદર્શી વિમુક્તાત્મા સર્વજ્ઞો જ્ઞાનમુત્તમં ‖ 48 ‖

સુવ્રતઃ સુમુખઃ સૂક્ષ્મઃ સુઘોષઃ સુખદઃ સુહૃત્ |
મનોહરો જિતક્રોધો વીર બાહુર્વિદારણઃ ‖ 49 ‖

સ્વાપનઃ સ્વવશો વ્યાપી નૈકાત્મા નૈકકર્મકૃત્| |
વત્સરો વત્સલો વત્સી રત્નગર્ભો ધનેશ્વરઃ ‖ 50 ‖

ધર્મગુબ્ધર્મકૃદ્ધર્મી સદસત્ક્ષરમક્ષરમ્‖
અવિજ્ઞાતા સહસ્ત્રાંશુર્વિધાતા કૃતલક્ષણઃ ‖ 51 ‖

ગભસ્તિનેમિઃ સત્ત્વસ્થઃ સિંહો ભૂત મહેશ્વરઃ |
આદિદેવો મહાદેવો દેવેશો દેવભૃદ્ગુરુઃ ‖ 52 ‖

ઉત્તરો ગોપતિર્ગોપ્તા જ્ઞાનગમ્યઃ પુરાતનઃ |
શરીર ભૂતભૃદ્ ભોક્તા કપીંદ્રો ભૂરિદક્ષિણઃ ‖ 53 ‖

સોમપોઽમૃતપઃ સોમઃ પુરુજિત્ પુરુસત્તમઃ |
વિનયો જયઃ સત્યસંધો દાશાર્હઃ સાત્વતાં પતિઃ ‖ 54 ‖

જીવો વિનયિતા સાક્ષી મુકુંદોઽમિત વિક્રમઃ |
અંભોનિધિરનંતાત્મા મહોદધિ શયોંતકઃ ‖ 55 ‖

અજો મહાર્હઃ સ્વાભાવ્યો જિતામિત્રઃ પ્રમોદનઃ |
આનંદોઽનંદનોનંદઃ સત્યધર્મા ત્રિવિક્રમઃ ‖ 56 ‖

મહર્ષિઃ કપિલાચાર્યઃ કૃતજ્ઞો મેદિનીપતિઃ |
ત્રિપદસ્ત્રિદશાધ્યક્ષો મહાશૃંગઃ કૃતાંતકૃત્ ‖ 57 ‖

મહાવરાહો ગોવિંદઃ સુષેણઃ કનકાંગદી |
ગુહ્યો ગભીરો ગહનો ગુપ્તશ્ચક્ર ગદાધરઃ ‖ 58 ‖

વેધાઃ સ્વાંગોઽજિતઃ કૃષ્ણો દૃઢઃ સંકર્ષણોઽચ્યુતઃ |
વરુણો વારુણો વૃક્ષઃ પુષ્કરાક્ષો મહામનાઃ ‖ 59 ‖

ભગવાન્ ભગહાઽઽનંદી વનમાલી હલાયુધઃ |
આદિત્યો જ્યોતિરાદિત્યઃ સહિષ્ણુર્ગતિસત્તમઃ ‖ 60 ‖

સુધન્વા ખંડપરશુર્દારુણો દ્રવિણપ્રદઃ |
દિવઃસ્પૃક્ સર્વદૃગ્વ્યાસો વાચસ્પતિરયોનિજઃ ‖ 61 ‖

ત્રિસામા સામગઃ સામ નિર્વાણં ભેષજં ભિષક્ |
સન્યાસકૃચ્છમઃ શાંતો નિષ્ઠા શાંતિઃ પરાયણમ્| 62 ‖

શુભાંગઃ શાંતિદઃ સ્રષ્ટા કુમુદઃ કુવલેશયઃ |
ગોહિતો ગોપતિર્ગોપ્તા વૃષભાક્ષો વૃષપ્રિયઃ ‖ 63 ‖

અનિવર્તી નિવૃત્તાત્મા સંક્ષેપ્તા ક્ષેમકૃચ્છિવઃ |
શ્રીવત્સવક્ષાઃ શ્રીવાસઃ શ્રીપતિઃ શ્રીમતાંવરઃ ‖ 64 ‖

શ્રીદઃ શ્રીશઃ શ્રીનિવાસઃ શ્રીનિધિઃ શ્રીવિભાવનઃ |
શ્રીધરઃ શ્રીકરઃ શ્રેયઃ શ્રીમાંલ્લોકત્રયાશ્રયઃ ‖ 65 ‖

સ્વક્ષઃ સ્વંગઃ શતાનંદો નંદિર્જ્યોતિર્ગણેશ્વરઃ |
વિજિતાત્માઽવિધેયાત્મા સત્કીર્તિચ્છિન્નસંશયઃ ‖ 66 ‖

ઉદીર્ણઃ સર્વતશ્ચક્ષુરનીશઃ શાશ્વતસ્થિરઃ |
ભૂશયો ભૂષણો ભૂતિર્વિશોકઃ શોકનાશનઃ ‖ 67 ‖

અર્ચિષ્માનર્ચિતઃ કુંભો વિશુદ્ધાત્મા વિશોધનઃ |
અનિરુદ્ધોઽપ્રતિરથઃ પ્રદ્યુમ્નોઽમિતવિક્રમઃ ‖ 68 ‖

કાલનેમિનિહા વીરઃ શૌરિઃ શૂરજનેશ્વરઃ |
ત્રિલોકાત્મા ત્રિલોકેશઃ કેશવઃ કેશિહા હરિઃ ‖ 69 ‖

કામદેવઃ કામપાલઃ કામી કાંતઃ કૃતાગમઃ |
અનિર્દેશ્યવપુર્વિષ્ણુર્વીરોઽનંતો ધનંજયઃ ‖ 70 ‖

બ્રહ્મણ્યો બ્રહ્મકૃદ્ બ્રહ્મા બ્રહ્મ બ્રહ્મવિવર્ધનઃ |
બ્રહ્મવિદ્ બ્રાહ્મણો બ્રહ્મી બ્રહ્મજ્ઞો બ્રાહ્મણપ્રિયઃ ‖ 71 ‖

મહાક્રમો મહાકર્મા મહાતેજા મહોરગઃ |
મહાક્રતુર્મહાયજ્વા મહાયજ્ઞો મહાહવિઃ ‖ 72 ‖

સ્તવ્યઃ સ્તવપ્રિયઃ સ્તોત્રં સ્તુતિઃ સ્તોતા રણપ્રિયઃ |
પૂર્ણઃ પૂરયિતા પુણ્યઃ પુણ્યકીર્તિરનામયઃ ‖ 73 ‖

મનોજવસ્તીર્થકરો વસુરેતા વસુપ્રદઃ |
વસુપ્રદો વાસુદેવો વસુર્વસુમના હવિઃ ‖ 74 ‖

સદ્ગતિઃ સત્કૃતિઃ સત્તા સદ્ભૂતિઃ સત્પરાયણઃ |
શૂરસેનો યદુશ્રેષ્ઠઃ સન્નિવાસઃ સુયામુનઃ ‖ 75 ‖

ભૂતાવાસો વાસુદેવઃ સર્વાસુનિલયોઽનલઃ |
દર્પહા દર્પદો દૃપ્તો દુર્ધરોઽથાપરાજિતઃ ‖ 76 ‖

વિશ્વમૂર્તિર્મહામૂર્તિર્દીપ્તમૂર્તિરમૂર્તિમાન્ |
અનેકમૂર્તિરવ્યક્તઃ શતમૂર્તિઃ શતાનનઃ ‖ 77 ‖

એકો નૈકઃ સવઃ કઃ કિં યત્તત્ પદમનુત્તમં |
લોકબંધુર્લોકનાથો માધવો ભક્તવત્સલઃ ‖ 78 ‖

સુવર્ણવર્ણો હેમાંગો વરાંગશ્ચંદનાંગદી |
વીરહા વિષમઃ શૂન્યો ઘૃતાશીરચલશ્ચલઃ ‖ 79 ‖

અમાની માનદો માન્યો લોકસ્વામી ત્રિલોકધૃક્ |
સુમેધા મેધજો ધન્યઃ સત્યમેધા ધરાધરઃ ‖ 80 ‖

તેજોઽવૃષો દ્યુતિધરઃ સર્વશસ્ત્રભૃતાંવરઃ |
પ્રગ્રહો નિગ્રહો વ્યગ્રો નૈકશૃંગો ગદાગ્રજઃ ‖ 81 ‖

ચતુર્મૂર્તિ શ્ચતુર્બાહુ શ્ચતુર્વ્યૂહ શ્ચતુર્ગતિઃ |
ચતુરાત્મા ચતુર્ભાવશ્ચતુર્વેદવિદેકપાત્ ‖ 82 ‖

સમાવર્તોઽનિવૃત્તાત્મા દુર્જયો દુરતિક્રમઃ |
દુર્લભો દુર્ગમો દુર્ગો દુરાવાસો દુરારિહા ‖ 83 ‖

શુભાંગો લોકસારંગઃ સુતંતુસ્તંતુવર્ધનઃ |
ઇંદ્રકર્મા મહાકર્મા કૃતકર્મા કૃતાગમઃ ‖ 84 ‖

ઉદ્ભવઃ સુંદરઃ સુંદો રત્નનાભઃ સુલોચનઃ |
અર્કો વાજસનઃ શૃંગી જયંતઃ સર્વવિજ્જયી ‖ 85 ‖

સુવર્ણબિંદુરક્ષોભ્યઃ સર્વવાગીશ્વરેશ્વરઃ |
મહાહૃદો મહાગર્તો મહાભૂતો મહાનિધિઃ ‖ 86 ‖

કુમુદઃ કુંદરઃ કુંદઃ પર્જન્યઃ પાવનોઽનિલઃ |
અમૃતાશોઽમૃતવપુઃ સર્વજ્ઞઃ સર્વતોમુખઃ ‖ 87 ‖

સુલભઃ સુવ્રતઃ સિદ્ધઃ શત્રુજિચ્છત્રુતાપનઃ |
ન્યગ્રોધોઽદુંબરોઽશ્વત્થશ્ચાણૂરાંધ્ર નિષૂદનઃ ‖ 88 ‖

સહસ્રાર્ચિઃ સપ્તજિહ્વઃ સપ્તૈધાઃ સપ્તવાહનઃ |
અમૂર્તિરનઘોઽચિંત્યો ભયકૃદ્ભયનાશનઃ ‖ 89 ‖

અણુર્બૃહત્કૃશઃ સ્થૂલો ગુણભૃન્નિર્ગુણો મહાન્ |
અધૃતઃ સ્વધૃતઃ સ્વાસ્યઃ પ્રાગ્વંશો વંશવર્ધનઃ ‖ 90 ‖

ભારભૃત્ કથિતો યોગી યોગીશઃ સર્વકામદઃ |
આશ્રમઃ શ્રમણઃ, ક્ષામઃ સુપર્ણો વાયુવાહનઃ ‖ 91 ‖

ધનુર્ધરો ધનુર્વેદો દંડો દમયિતા દમઃ |
અપરાજિતઃ સર્વસહો નિયંતાઽનિયમોઽયમઃ ‖ 92 ‖

સત્ત્વવાન્ સાત્ત્વિકઃ સત્યઃ સત્યધર્મપરાયણઃ |
અભિપ્રાયઃ પ્રિયાર્હોઽર્હઃ પ્રિયકૃત્ પ્રીતિવર્ધનઃ ‖ 93 ‖

વિહાયસગતિર્જ્યોતિઃ સુરુચિર્હુતભુગ્વિભુઃ |
રવિર્વિરોચનઃ સૂર્યઃ સવિતા રવિલોચનઃ ‖ 94 ‖

અનંતો હુતભુગ્ભોક્તા સુખદો નૈકજોઽગ્રજઃ |
અનિર્વિણ્ણઃ સદામર્ષી લોકધિષ્ઠાનમદ્ભુતઃ ‖ 95 ‖

સનાત્સનાતનતમઃ કપિલઃ કપિરવ્યયઃ |
સ્વસ્તિદઃ સ્વસ્તિકૃત્સ્વસ્તિઃ સ્વસ્તિભુક્ સ્વસ્તિદક્ષિણઃ ‖ 96 ‖

અરૌદ્રઃ કુંડલી ચક્રી વિક્રમ્યૂર્જિતશાસનઃ |
શબ્દાતિગઃ શબ્દસહઃ શિશિરઃ શર્વરીકરઃ ‖ 97 ‖

અક્રૂરઃ પેશલો દક્ષો દક્ષિણઃ, ક્ષમિણાંવરઃ |
વિદ્વત્તમો વીતભયઃ પુણ્યશ્રવણકીર્તનઃ ‖ 98 ‖

ઉત્તારણો દુષ્કૃતિહા પુણ્યો દુઃસ્વપ્નનાશનઃ |
વીરહા રક્ષણઃ સંતો જીવનઃ પર્યવસ્થિતઃ ‖ 99 ‖

અનંતરૂપોઽનંત શ્રીર્જિતમન્યુર્ભયાપહઃ |
ચતુરશ્રો ગભીરાત્મા વિદિશો વ્યાદિશો દિશઃ ‖ 100 ‖

અનાદિર્ભૂર્ભુવો લક્ષ્મીઃ સુવીરો રુચિરાંગદઃ |
જનનો જનજન્માદિર્ભીમો ભીમપરાક્રમઃ ‖ 101 ‖

આધારનિલયોઽધાતા પુષ્પહાસઃ પ્રજાગરઃ |
ઊર્ધ્વગઃ સત્પથાચારઃ પ્રાણદઃ પ્રણવઃ પણઃ ‖ 102 ‖

પ્રમાણં પ્રાણનિલયઃ પ્રાણભૃત્ પ્રાણજીવનઃ |
તત્ત્વં તત્ત્વવિદેકાત્મા જન્મમૃત્યુજરાતિગઃ ‖ 103 ‖

ભૂર્ભુવઃ સ્વસ્તરુસ્તારઃ સવિતા પ્રપિતામહઃ |
યજ્ઞો યજ્ઞપતિર્યજ્વા યજ્ઞાંગો યજ્ઞવાહનઃ ‖ 104 ‖

યજ્ઞભૃદ્ યજ્ઞકૃદ્ યજ્ઞી યજ્ઞભુક્ યજ્ઞસાધનઃ |
યજ્ઞાંતકૃદ્ યજ્ઞગુહ્યમન્નમન્નાદ એવ ચ ‖ 105 ‖

આત્મયોનિઃ સ્વયંજાતો વૈખાનઃ સામગાયનઃ |
દેવકીનંદનઃ સ્રષ્ટા ક્ષિતીશઃ પાપનાશનઃ ‖ 106 ‖

શંખભૃન્નંદકી ચક્રી શારંગધન્વા ગદાધરઃ |
રથાંગપાણિરક્ષોભ્યઃ સર્વપ્રહરણાયુધઃ ‖ 107 ‖

શ્રી સર્વપ્રહરણાયુધ ઓં નમ ઇતિ |

વનમાલી ગદી શારંગી શંખી ચક્રી ચ નંદકી |
શ્રીમાન્નારાયણો વિષ્ણુર્વાસુદેવોઽભિરક્ષતુ ‖ 108 ‖

શ્રી વાસુદેવોઽભિરક્ષતુ ઓં નમ ઇતિ |

વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ સ્તોત્રનું મહત્વ

ભગવાન વિષ્ણુને વિશ્વના પાલનહાર માનવામાં આવે છે અને તેમના સહસ્ત્રનામનો પાઠ કરવાથી ભક્તોને આધ્યાત્મિક શક્તિ અને માનસિક શાંતિ મળે છે. આ સ્તોત્રનું માત્ર ધાર્મિક મહત્વ નથી પરંતુ તે વ્યક્તિને નૈતિક અને ભૌતિક પ્રગતિ તરફ પણ લઈ જાય છે.

વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામનો પાઠ કેવી રીતે કરવો?

તૈયારી: સ્નાન કરો, સ્વચ્છ વસ્ત્રો પહેરો અને પૂજા સ્થળ સાફ કરો.
પૂજા સ્થળની સજાવટ: ભગવાન વિષ્ણુની મૂર્તિ અથવા ચિત્રની સામે દીવો પ્રગટાવો અને ફૂલ ચઢાવો.
મંત્ર જાપઃ ‘વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ સ્તોત્ર’ શાંતિથી અને ધ્યાનપૂર્વક પાઠ કરો. દરેક નામનો સ્પષ્ટ ઉચ્ચાર કરો.
ધ્યાન: પાઠ પછી થોડીવાર ધ્યાન માં બેસી ભગવાન વિષ્ણુ ના દિવ્ય ગુણોનું ચિંતન કરો.

વિષ્ણુ સહસ્રનામ સ્તોત્રના ફાયદા

માનસિક શાંતિઃ નિયમિત પાઠ કરવાથી માનસિક તણાવ અને ચિંતા ઓછી થાય છે.
આધ્યાત્મિક પ્રગતિ: તેના પાઠ કરવાથી આધ્યાત્મિક શક્તિ વધે છે અને વ્યક્તિ આધ્યાત્મિક રીતે ઉન્નત બને છે.
સંરક્ષણ અને રક્ષણ: એવું માનવામાં આવે છે કે વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામનો પાઠ કરવાથી જીવનની વિવિધ અવરોધો અને નકારાત્મક શક્તિઓથી રક્ષણ મળે છે.
ભૌતિક લાભો: તેના પાઠ કરવાથી માત્ર આધ્યાત્મિક જ નહીં પરંતુ ભૌતિક લાભ પણ મળે છે.

વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ સ્તોત્રનો પાઠ કરવાથી તમારા રોજિંદા જીવનમાં માત્ર શાંતિ જ નથી આવતી પરંતુ તે તમને ભગવાન વિષ્ણુની નજીક લાવવામાં પણ મદદ કરે છે. આ પવિત્ર ગ્રંથને તમારા જીવનમાં સામેલ કરીને, તમે અદ્ભુત આધ્યાત્મિક અને ભૌતિક લાભો મેળવી શકો છો.

વિષ્ણુ સહસ્રનામ સ્તોત્ર, વિષ્ણુ પૂજા પદ્ધતિ, વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામના ફાયદા, હિન્દુ ધાર્મિક પાઠ, વિષ્ણુ સ્તોત્રનું મહત્વ, વિષ્ણુ ભક્તિ પદ્ધતિ, વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામનો પાઠ કેવી રીતે કરવો, આધ્યાત્મિક વિકાસના માધ્યમ

તમિળ / તેલગુ / ગુજરાતી / મરાઠી / અંગ્રેજીમાં વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ સ્તોત્રા

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આરતી ઓમ જય જગદીશ હરે
શ્રી સત્યનારાયણ વ્રત કથા
Vishnu Sahasranama Stotram
विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र
বিষ্ণু সহস্রনাম বাংলায়
વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ ગુજરાતીમાં
विष्णु मंत्र
Vishnu Mantra in English
आरती ओम जय जगदीश हरे
Om Jai Jagdish Hare Aarti In English

Pitra Stotra in Hindi PDF

अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ।

नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।

इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।

सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ।।

मन्वादीनां मुनीन्द्राणां सूर्याचन्द्रमसोस्तथा ।

तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि ।।

नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।

द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।

अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येsहं कृताञ्जलि:।।

प्रजापते: कश्यपाय सोमाय वरुणाय च ।

योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु ।

स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ।।

सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा ।

नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ।।

अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम् ।

अग्नीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत:।।

ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तय:।

जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण:।।

तेभ्योsखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतमानस:।

नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुज:।।.

Pitra\Pitru Stotra in Hindi PDF Download

Vishnu Sahasranama Stotram
विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र
বিষ্ণু সহস্রনাম বাংলায়
વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ ગુજરાતીમાં
विष्णु मंत्र
Vishnu Mantra in English
आरती ओम जय जगदीश हरे
Om Jai Jagdish Hare Aarti In English

पितृ स्तोत्र

अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ।

नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।

इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।

सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ।।

मन्वादीनां मुनीन्द्राणां सूर्याचन्द्रमसोस्तथा ।

तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि ।।

नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।

द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।

अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येsहं कृताञ्जलि:।।

प्रजापते: कश्यपाय सोमाय वरुणाय च ।

योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु ।

स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ।।

सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा ।

नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ।।

अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम् ।

अग्नीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत:।।

ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तय:।

जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण:।।

तेभ्योsखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतमानस:।

नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुज:।।.

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विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र
বিষ্ণু সহস্রনাম বাংলায়
વિષ્ણુ સહસ્ત્રનામ ગુજરાતીમાં
विष्णु मंत्र
Vishnu Mantra in English
आरती ओम जय जगदीश हरे
Om Jai Jagdish Hare Aarti In English