Shri Badrinarayan Aarti

Shri Badrinarayan Aartiin Hindi/Sanskrit Lyrics

पवन मंद सुगन्ध शीतल हेम मन्दिर शोभितम् |

निकट गंगाबहत निर्मल श्रीबद्रीनाथ विश्वम्भरम् ||

शेष सुमरन करत निशदिन धरत ध्यान महेश्वर |

श्रीवेद ब्रह्मा करत स्तुति श्रीबद्रीनाथ विश्वम्भरम् ||

शक्ति गौरी गणेश शारद मुनि उच्चारणम् |

जोग ध्यान अपार लीला श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्

इन्द्र चन्द्र कुबेर धुनिकर धूप दीप प्रकाशितम् |

सिद्धि मुनिजन करत जै जै श्रीबद्रीनाथ विश्वम्भरम्

यक्ष कित्रर करत कौतुक ज्ञान गन्धर्व प्रकाशितम्

श्रीलक्ष्मीकमला चँवरडोलें श्रीबद्रीनाथ विश्वम्भरम्

कैलाश में एक देव निरंजन शैल शिखर महेश्वरम्

राजा युधिष्ठिर करत स्तुति श्रीबद्रीनाथ विश्वम्भरम् |

कोटि तीरथ भवेत् पुण्यं प्राप्यते फलदायकम् ||

How to chant Shri Badrinarayan Aarti

Benefits of Shri Badrinarayan Aarti

Shri Badrinarayan Aarti in Tamil/Telgu/Gujrati/Marathi/English

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श्री बद्रीनारायण जी की आरती

श्री बद्रीनारायण जी की आरती इन हिंदी लिरिक्स

पवन मंद सुगन्ध शीतल हेम मन्दिर शोभितम् |

निकट गंगाबहत निर्मल श्रीबद्रीनाथ विश्वम्भरम् ||

शेष सुमरन करत निशदिन धरत ध्यान महेश्वर |

श्रीवेद ब्रह्मा करत स्तुति श्रीबद्रीनाथ विश्वम्भरम् ||

शक्ति गौरी गणेश शारद मुनि उच्चारणम् |

जोग ध्यान अपार लीला श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्

इन्द्र चन्द्र कुबेर धुनिकर धूप दीप प्रकाशितम् |

सिद्धि मुनिजन करत जै जै श्रीबद्रीनाथ विश्वम्भरम्

यक्ष कित्रर करत कौतुक ज्ञान गन्धर्व प्रकाशितम्

श्रीलक्ष्मीकमला चँवरडोलें श्रीबद्रीनाथ विश्वम्भरम्

कैलाश में एक देव निरंजन शैल शिखर महेश्वरम्

राजा युधिष्ठिर करत स्तुति श्रीबद्रीनाथ विश्वम्भरम् |

कोटि तीरथ भवेत् पुण्यं प्राप्यते फलदायकम् ||

बद्रीनारायण जी की आरती का पाठ

बद्रीनारायण जी की आरती के लाभ

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नारायण सुक्तम

नारायण सुक्तम

सहस्र शीर्षं देवं विश्वाक्षं विश्वशंभुवम् ।
विश्वै नारायणं देवं अक्षरं परमं पदम् ॥
विश्वतः परमान्नित्यं विश्वं नारायणं हरिम् ।
विश्वं एव इदं पुरुषः तद्विश्वं उपजीवति ॥
पतिं विश्वस्य आत्मा ईश्वरं शाश्वतं शिवमच्युतम् ।
नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम् ॥
नारायण परो ज्योतिरात्मा नारायणः परः ।
नारायण परं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परः ।
नारायण परो ध्याता ध्यानं नारायणः परः ॥
यच्च किंचित् जगत् सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा ।
अंतर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ॥
अनन्तं अव्ययं कविं समुद्रेन्तं विश्वशंभुवम् ।
पद्म कोश प्रतीकाशं हृदयं च अपि अधोमुखम् ॥
अधो निष्ठ्या वितस्त्यान्ते नाभ्याम् उपरि तिष्ठति ।
ज्वालामालाकुलं भाती विश्वस्यायतनं महत् ॥
सन्ततं शिलाभिस्तु लम्बत्या कोशसन्निभम् ।
तस्यान्ते सुषिरं सूक्ष्मं तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥
तस्य मध्ये महानग्निः विश्वार्चिः विश्वतो मुखः ।
सोऽग्रविभजंतिष्ठन् आहारं अजरः कविः ॥
तिर्यगूर्ध्वमधश्शायी रश्मयः तस्य सन्तता ।
सन्तापयति स्वं देहमापादतलमास्तकः ।
तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिताः ॥
नीलतोयद-मध्यस्थ-द्विद्युल्लेखेव भास्वरा ।
नीवारशूकवत्तन्वी पीता भास्वत्यणूपमा ॥
तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः ।
स ब्रह्म स शिवः स हरिः स इन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ॥
ऋतं सत्यं परं ब्रह्म पुरुषं कृष्ण पिङ्गलम् ।
ऊर्ध्वरेतं विरूपाक्षं विश्वरूपाय वै नमो नमः ॥

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि ।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥

ॐ शांति शांति शांतिः ॥

नारायण सुक्तम का पाठ

नारायण सुक्तम के लाभ

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Narayan Suktam

Narayan Suktam in Hindi/Sanskrit Lyrics

सहस्र शीर्षं देवं विश्वाक्षं विश्वशंभुवम् ।
विश्वै नारायणं देवं अक्षरं परमं पदम् ॥
विश्वतः परमान्नित्यं विश्वं नारायणं हरिम् ।
विश्वं एव इदं पुरुषः तद्विश्वं उपजीवति ॥
पतिं विश्वस्य आत्मा ईश्वरं शाश्वतं शिवमच्युतम् ।
नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम् ॥
नारायण परो ज्योतिरात्मा नारायणः परः ।
नारायण परं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परः ।
नारायण परो ध्याता ध्यानं नारायणः परः ॥
यच्च किंचित् जगत् सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा ।
अंतर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ॥
अनन्तं अव्ययं कविं समुद्रेन्तं विश्वशंभुवम् ।
पद्म कोश प्रतीकाशं हृदयं च अपि अधोमुखम् ॥
अधो निष्ठ्या वितस्त्यान्ते नाभ्याम् उपरि तिष्ठति ।
ज्वालामालाकुलं भाती विश्वस्यायतनं महत् ॥
सन्ततं शिलाभिस्तु लम्बत्या कोशसन्निभम् ।
तस्यान्ते सुषिरं सूक्ष्मं तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥
तस्य मध्ये महानग्निः विश्वार्चिः विश्वतो मुखः ।
सोऽग्रविभजंतिष्ठन् आहारं अजरः कविः ॥
तिर्यगूर्ध्वमधश्शायी रश्मयः तस्य सन्तता ।
सन्तापयति स्वं देहमापादतलमास्तकः ।
तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिताः ॥
नीलतोयद-मध्यस्थ-द्विद्युल्लेखेव भास्वरा ।
नीवारशूकवत्तन्वी पीता भास्वत्यणूपमा ॥
तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः ।
स ब्रह्म स शिवः स हरिः स इन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ॥
ऋतं सत्यं परं ब्रह्म पुरुषं कृष्ण पिङ्गलम् ।
ऊर्ध्वरेतं विरूपाक्षं विश्वरूपाय वै नमो नमः ॥

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि ।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥

ॐ शांति शांति शांतिः ॥

How to chant Narayana Suktam

Benefits of Narayana Suktam

Narayana Suktam in Tamil/Telgu/Gujrati/Marathi/English

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नारायण स्तोत्रम

नारायण स्तोत्रम इन हिंदी लिरिक्स

नारायण नारायण जय गोविन्द हरे ॥

नारायण नारायण जय गोपाल हरे ॥

करुणापारावार वरुणालयगम्भीर नारायण ॥ 1 ॥

घननीरदसङ्काश कृतकलिकल्मषनाशन नारायण ॥ 2 ॥

यमुनातीरविहार धृतकौस्तुभमणिहार नारायण ॥ 3 ॥

पीताम्बरपरिधान सुरकल्याणनिधान नारायण ॥ 4 ॥

मञ्जुलगुञ्जाभूष मायामानुषवेष नारायण ॥ 5 ॥

राधाधरमधुरसिक रजनीकरकुलतिलक नारायण ॥ 6 ॥

मुरलीगानविनोद वेदस्तुतभूपाद नारायण ॥ 7 ॥

बर्हिनिबर्हापीड नटनाटकफणिक्रीड नारायण ॥ 8 ॥

वारिजभूषाभरण राजीवरुक्मिणीरमण नारायण ॥ 9 ॥

जलरुहदलनिभनेत्र जगदारम्भकसूत्र नारायण ॥ 10 ॥

पातकरजनीसंहार करुणालय मामुद्धर नारायण ॥ 11 ॥

अघ बकहयकंसारे केशव कृष्ण मुरारे नारायण ॥ 12 ॥

हाटकनिभपीताम्बर अभयं कुरु मे मावर नारायण ॥ 13 ॥

दशरथराजकुमार दानवमदसंहार नारायण ॥ 14 ॥

गोवर्धनगिरि रमण गोपीमानसहरण नारायण ॥ 15 ॥

सरयुतीरविहार सज्जन‌ऋषिमन्दार नारायण ॥ 16 ॥

विश्वामित्रमखत्र विविधवरानुचरित्र नारायण ॥ 17 ॥

ध्वजवज्राङ्कुशपाद धरणीसुतसहमोद नारायण ॥ 18 ॥

जनकसुताप्रतिपाल जय जय संस्मृतिलील नारायण ॥ 19 ॥

दशरथवाग्धृतिभार दण्डक वनसञ्चार नारायण ॥ 20 ॥

मुष्टिकचाणूरसंहार मुनिमानसविहार नारायण ॥ 21 ॥

वालिविनिग्रहशौर्य वरसुग्रीवहितार्य नारायण ॥ 22 ॥

मां मुरलीकर धीवर पालय पालय श्रीधर नारायण ॥ 23 ॥

जलनिधि बन्धन धीर रावणकण्ठविदार नारायण ॥ 24 ॥

ताटकमर्दन राम नटगुणविविध सुराम नारायण ॥ 25 ॥

गौतमपत्नीपूजन करुणाघनावलोकन नारायण ॥ 26 ॥

सम्भ्रमसीताहार साकेतपुरविहार नारायण ॥ 27 ॥

अचलोद्धृतचञ्चत्कर भक्तानुग्रहतत्पर नारायण ॥ 28 ॥

नैगमगानविनोद रक्षित सुप्रह्लाद नारायण ॥ 29 ॥

भारत यतवरशङ्कर नामामृतमखिलान्तर नारायण ॥ 30 ॥

नारायण स्तोत्रम का पाठ

नारायण स्तोत्रम पाठ के लाभ

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Narayana Stotram

Narayana Stotram in Hindi/Sanskrit Lyrics

नारायण नारायण जय गोविन्द हरे ॥

नारायण नारायण जय गोपाल हरे ॥

करुणापारावार वरुणालयगम्भीर नारायण ॥ 1 ॥

घननीरदसङ्काश कृतकलिकल्मषनाशन नारायण ॥ 2 ॥

यमुनातीरविहार धृतकौस्तुभमणिहार नारायण ॥ 3 ॥

पीताम्बरपरिधान सुरकल्याणनिधान नारायण ॥ 4 ॥

मञ्जुलगुञ्जाभूष मायामानुषवेष नारायण ॥ 5 ॥

राधाधरमधुरसिक रजनीकरकुलतिलक नारायण ॥ 6 ॥

मुरलीगानविनोद वेदस्तुतभूपाद नारायण ॥ 7 ॥

बर्हिनिबर्हापीड नटनाटकफणिक्रीड नारायण ॥ 8 ॥

वारिजभूषाभरण राजीवरुक्मिणीरमण नारायण ॥ 9 ॥

जलरुहदलनिभनेत्र जगदारम्भकसूत्र नारायण ॥ 10 ॥

पातकरजनीसंहार करुणालय मामुद्धर नारायण ॥ 11 ॥

अघ बकहयकंसारे केशव कृष्ण मुरारे नारायण ॥ 12 ॥

हाटकनिभपीताम्बर अभयं कुरु मे मावर नारायण ॥ 13 ॥

दशरथराजकुमार दानवमदसंहार नारायण ॥ 14 ॥

गोवर्धनगिरि रमण गोपीमानसहरण नारायण ॥ 15 ॥

सरयुतीरविहार सज्जन‌ऋषिमन्दार नारायण ॥ 16 ॥

विश्वामित्रमखत्र विविधवरानुचरित्र नारायण ॥ 17 ॥

ध्वजवज्राङ्कुशपाद धरणीसुतसहमोद नारायण ॥ 18 ॥

जनकसुताप्रतिपाल जय जय संस्मृतिलील नारायण ॥ 19 ॥

दशरथवाग्धृतिभार दण्डक वनसञ्चार नारायण ॥ 20 ॥

मुष्टिकचाणूरसंहार मुनिमानसविहार नारायण ॥ 21 ॥

वालिविनिग्रहशौर्य वरसुग्रीवहितार्य नारायण ॥ 22 ॥

मां मुरलीकर धीवर पालय पालय श्रीधर नारायण ॥ 23 ॥

जलनिधि बन्धन धीर रावणकण्ठविदार नारायण ॥ 24 ॥

ताटकमर्दन राम नटगुणविविध सुराम नारायण ॥ 25 ॥

गौतमपत्नीपूजन करुणाघनावलोकन नारायण ॥ 26 ॥

सम्भ्रमसीताहार साकेतपुरविहार नारायण ॥ 27 ॥

अचलोद्धृतचञ्चत्कर भक्तानुग्रहतत्पर नारायण ॥ 28 ॥

नैगमगानविनोद रक्षित सुप्रह्लाद नारायण ॥ 29 ॥

भारत यतवरशङ्कर नामामृतमखिलान्तर नारायण ॥ 30 ॥

How to chant Narayana Stotram

Benefits of Narayana Stotram

Narayana Stotram in Tamil/Telgu/Gujrati/Marathi/English

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Aarti Om Jai Jagdish Hare

Aarti Om Jai Jagdish Hare Hindi Lyrics

आरती ओम जय जगदीश हरे

जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे

भक्त जनों के संकट क्षण में दूर करे || जय ||

जो ध्यावे फल पावे दुःख विनाशे मनका

सुख संपति घर आवे कष्ट मिटे तनका || जय ||

मात पिता तुम मेरे शरण गहुँ किसकी

तुम बिन और दूजा आस करू जिसकी || जय ||

तुम पूरण परमात्मा तुम अंतर्यामी

पारब्रम्हा परमेश्वर तुम सबके स्वामी || जय ||

तुम करुणा के सागर तुम पालन करता

मैं मुरख खलकामी कृपा करो भरता || जय ||

तुम हो एक अगोचर सबके प्राण पती

किस विधि मिलूं गुसाई तुमको मैं कुमती || जय ||

दीनबंधु दुःख हरता तुम रक्षक मेरे

अपने हाथ उठाओ द्वार पड़ा तेरे || जय ||

विषय विकार मिटाओ पाप हरो देवा

श्रद्धा भक्ति बढाओ संतान की सेवा || जय ||

तन मन धन जो कुछ है, सब ही है तेरा

तेरा तुझको अर्पण, क्या लगत मेरा || जय ||

According to Hindu Mythology singing Aarti Om Jai Jagdish Hare on a regular basis is the best way to please God Vishnu and get his blessing.

How to chant Aarti Om Jai Jagdish Hare

To get the best result you should sing Aarti Om Jai Jagdish Hare early morning after taking bath and in front of God Lakshmi Narayan Idol or picture. You should first understand the Aarti Om Jai Jagdish Hare meaning in hindi to maximize its effect.

Benefits of Aarti Om Jai Jagdish Hare

आरती ओम जय जगदीश हरे के लाभ

Regular recitation of Aarti Om Jai Jagdish Hare gives peace of mind and keeps away all the evil from your life and makes you healthy, wealthy and prosperous.

Aarti Om Jai Jagdish Hare in Tamil/Telgu/Gujrati/Marathi/English

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Brihaspativar Vrat Katha

Guruvar Vrat Katha in Hindi

प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक बड़ा व्यापारी रहता था। वह जहाजों में माल लदवाकर दूसरे देशों में भेजा करता था। वह जिस प्रकार अधिक धन कमाता था उसी प्रकार जी खोलकर दान भी करता था, परंतु उसकी पत्नी अत्यंत कंजूस थी। वह किसी को एक दमड़ी भी नहीं देने देती थी।
एक बार सेठ जब दूसरे देश व्यापार करने गया तो पीछे से बृहस्पतिदेव ने साधु-वेश में उसकी पत्नी से भिक्षा मांगी। व्यापारी की पत्नी बृहस्पतिदेव से बोली हे साधु महाराज, मैं इस दान और पुण्य से तंग आ गई हूं। आप कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मेरा सारा धन नष्ट हो जाए और मैं आराम से रह सकूं। मैं यह धन लुटता हुआ नहीं देख सकती।
बृहस्पतिदेव ने कहा, हे देवी, तुम बड़ी विचित्र हो, संतान और धन से कोई दुखी होता है। अगर अधिक धन है तो इसे शुभ कार्यों में लगाओ, कुंवारी कन्याओं का विवाह कराओ, विद्यालय और बाग-बगीचों का निर्माण कराओ। ऐसे पुण्य कार्य करने से तुम्हारा लोक-परलोक सार्थक हो सकता है, परन्तु साधु की इन बातों से व्यापारी की पत्नी को ख़ुशी नहीं हुई। उसने कहा- मुझे ऐसे धन की आवश्यकता नहीं है, जिसे मैं दान दूं।
तब बृहस्पतिदेव बोले “यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो तुम एक उपाय करना। सात बृहस्पतिवार घर को गोबर से लीपना, अपने केशों को पीली मिटटी से धोना, केशों को धोते समय स्नान करना, व्यापारी से हजामत बनाने को कहना, भोजन में मांस-मदिरा खाना, कपड़े अपने घर धोना। ऐसा करने से तुम्हारा सारा धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर बृहस्पतिदेव अंतर्ध्यान हो गए।
व्यापारी की पत्नी ने बृहस्पति देव के कहे अनुसार सात बृहस्पतिवार वैसा ही करने का निश्चय किया। केवल तीन बृहस्पतिवार बीते थे कि उसी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई और वह परलोक सिधार गई। जब व्यापारी वापस आया तो उसने देखा कि उसका सब कुछ नष्ट हो चुका है। उस व्यापारी ने अपनी पुत्री को सांत्वना दी और दूसरे नगर में जाकर बस गया। वहां वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता। इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा।
एक दिन उसकी पुत्री ने दही खाने की इच्छा प्रकट की लेकिन व्यापारी के पास दही खरीदने के पैसे नहीं थे। वह अपनी पुत्री को आश्वासन देकर जंगल में लकड़ी काटने चला गया। वहां एक वृक्ष के नीचे बैठ अपनी पूर्व दशा पर विचार कर रोने लगा। उस दिन बृहस्पतिवार था। तभी वहां बृहस्पतिदेव साधु के रूप में सेठ के पास आए और बोले “हे मनुष्य, तू इस जंगल में किस चिंता में बैठा है?”
तब व्यापारी बोला “हे महाराज, आप सब कुछ जानते हैं।” इतना कहकर व्यापारी अपनी कहानी सुनाकर रो पड़ा। बृहस्पतिदेव बोले “देखो बेटा, तुम्हारी पत्नी ने बृहस्पति देव का अपमान किया था इसी कारण तुम्हारा यह हाल हुआ है लेकिन अब तुम किसी प्रकार की चिंता मत करो। तुम गुरुवार के दिन बृहस्पतिदेव का पाठ करो। दो पैसे के चने और गुड़ को लेकर जल के लोटे में शक्कर डालकर वह अमृत और प्रसाद अपने परिवार के सदस्यों और कथा सुनने वालों में बांट दो। स्वयं भी प्रसाद और चरणामृत लो। भगवान तुम्हारा अवश्य कल्याण करेंगे।”
साधु की बात सुनकर व्यापारी बोला “महाराज। मुझे तो इतना भी नहीं बचता कि मैं अपनी पुत्री को दही लाकर दे सकूं।” इस पर साधु जी बोले “तुम लकड़ियां शहर में बेचने जाना, तुम्हें लकड़ियों के दाम पहले से चौगुने मिलेंगे, जिससे तुम्हारे सारे कार्य सिद्ध हो जाएंगे।”
लकड़हारे ने लकड़ियां काटीं और शहर में बेचने के लिए चल पड़ा। उसकी लकड़ियां अच्छे दाम में बिक गई जिससे उसने अपनी पुत्री के लिए दही लिया और गुरुवार की कथा हेतु चना, गुड़ लेकर कथा की और प्रसाद बांटकर स्वयं भी खाया। उसी दिन से उसकी सभी कठिनाइयां दूर होने लगीं, परंतु अगले बृहस्पतिवार को वह कथा करना भूल गया।
अगले दिन वहां के राजा ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन कर पूरे नगर के लोगों के लिए भोज का आयोजन किया। राजा की आज्ञा अनुसार पूरा नगर राजा के महल में भोज करने गया। लेकिन व्यापारी व उसकी पुत्री तनिक विलंब से पहुंचे, अत: उन दोनों को राजा ने महल में ले जाकर भोजन कराया। जब वे दोनों लौटकर आए तब रानी ने देखा कि उसका खूंटी पर टंगा हार गायब है। रानी को व्यापारी और उसकी पुत्री पर संदेह हुआ कि उसका हार उन दोनों ने ही चुराया है। राजा की आज्ञा से उन दोनों को कारावास की कोठरी में कैद कर दिया गया। कैद में पड़कर दोनों अत्यंत दुखी हुए। वहां उन्होंने बृहस्पति देवता का स्मरण किया। बृहस्पति देव ने प्रकट होकर व्यापारी को उसकी भूल का आभास कराया और उन्हें सलाह दी कि गुरुवार के दिन कैदखाने के दरवाजे पर तुम्हें दो पैसे मिलेंगे उनसे तुम चने और मुनक्का मंगवाकर विधिपूर्वक बृहस्पति देवता का पूजन करना। तुम्हारे सब दुख दूर हो जाएंगे।
बृहस्पतिवार को कैदखाने के द्वार पर उन्हें दो पैसे मिले। बाहर सड़क पर एक स्त्री जा रही थी। व्यापारी ने उसे बुलाकार गुड़ और चने लाने को कहा। इसपर वह स्त्री बोली “मैं अपनी बहू के लिए गहने लेने जा रही हूं, मेरे पास समय नहीं है।” इतना कहकर वह चली गई। थोड़ी देर बाद वहां से एक और स्त्री निकली, व्यापारी ने उसे बुलाकर कहा कि हे बहन मुझे बृहस्पतिवार की कथा करनी है। तुम मुझे दो पैसे का गुड़-चना ला दो।
बृहस्पतिदेव का नाम सुनकर वह स्त्री बोली “भाई, मैं तुम्हें अभी गुड़-चना लाकर देती हूं। मेरा इकलौता पुत्र मर गया है, मैं उसके लिए कफन लेने जा रही थी लेकिन मैं पहले तुम्हारा काम करूंगी, उसके बाद अपने पुत्र के लिए कफन लाऊंगी।”
वह स्त्री बाजार से व्यापारी के लिए गुड़-चना ले आई और स्वयं भी बृहस्पतिदेव की कथा सुनी। कथा के समाप्त होने पर वह स्त्री कफन लेकर अपने घर गई। घर पर लोग उसके पुत्र की लाश को “राम नाम सत्य है” कहते हुए श्मशान ले जाने की तैयारी कर रहे थे। स्त्री बोली “मुझे अपने लड़के का मुख देख लेने दो।” अपने पुत्र का मुख देखकर उस स्त्री ने उसके मुंह में प्रसाद और चरणामृत डाला। प्रसाद और चरणामृत के प्रभाव से वह पुन: जीवित हो गया।
पहली स्त्री जिसने बृहस्पतिदेव का निरादर किया था, वह जब अपने पुत्र के विवाह हेतु पुत्रवधू के लिए गहने लेकर लौटी और जैसे ही उसका पुत्र घोड़ी पर बैठकर निकला वैसे ही घोड़ी ने ऐसी उछाल मारी कि वह घोड़ी से गिरकर मर गया। यह देख स्त्री रो-रोकर बृहस्पति देव से क्षमा याचना करने लगी।
उस स्त्री की याचना से बृहस्पतिदेव साधु वेश में वहां पहुंचकर कहने लगे “देवी। तुम्हें अधिक विलाप करने की आवश्यकता नहीं है। यह बृहस्पतिदेव का अनादार करने के कारण हुआ है। तुम वापस जाकर मेरे भक्त से क्षमा मांगकर कथा सुनो, तब ही तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी।”
जेल में जाकर उस स्त्री ने व्यापारी से माफी मांगी और कथा सुनी। कथा के उपरांत वह प्रसाद और चरणामृत लेकर अपने घर वापस गई। घर आकर उसने चरणामृत अपने मृत पुत्र के मुख में डाला| चरणामृत के प्रभाव से उसका पुत्र भी जीवित हो उठा। उसी रात बृहस्पतिदेव राजा के सपने में आए और बोले “हे राजन। तूने जिस व्यापारी और उसके पुत्री को जेल में कैद कर रखा है वह बिलकुल निर्दोष हैं। तुम्हारी रानी का हार वहीं खूंटी पर टंगा है।”
दिन निकला तो राजा रानी ने हार खूंटी पर लटका हुआ देखा। राजा ने उस व्यापारी और उसकी पुत्री को रिहा कर दिया और उन्हें आधा राज्य देकर उसकी पुत्री का विवाह उच्च कुल में करवाकर दहेज़ में हीरे-जवाहरात दिए।

How to do Brihaspatiwar Vrat Katha

Benefits of Guruvar Vrat Katha | Veervar Ki Katha

According to Hindu Mythology doing vrat and katha on Guruvar/Brihaspativar (Thursday) is the most powerful way to please Guru (Brihaspati) Grah and get his blessing.

Brihaspati Vrat Katha in Tamil/Telgu/Gujrati/Marathi/English

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बृहस्पतिवार व्रत कथा

गुरुवार व्रत कथा

बृहस्पतिवार व्रत कथा का पाठ

प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक बड़ा व्यापारी रहता था। वह जहाजों में माल लदवाकर दूसरे देशों में भेजा करता था। वह जिस प्रकार अधिक धन कमाता था उसी प्रकार जी खोलकर दान भी करता था, परंतु उसकी पत्नी अत्यंत कंजूस थी। वह किसी को एक दमड़ी भी नहीं देने देती थी।
एक बार सेठ जब दूसरे देश व्यापार करने गया तो पीछे से बृहस्पतिदेव ने साधु-वेश में उसकी पत्नी से भिक्षा मांगी। व्यापारी की पत्नी बृहस्पतिदेव से बोली हे साधु महाराज, मैं इस दान और पुण्य से तंग आ गई हूं। आप कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मेरा सारा धन नष्ट हो जाए और मैं आराम से रह सकूं। मैं यह धन लुटता हुआ नहीं देख सकती।
बृहस्पतिदेव ने कहा, हे देवी, तुम बड़ी विचित्र हो, संतान और धन से कोई दुखी होता है। अगर अधिक धन है तो इसे शुभ कार्यों में लगाओ, कुंवारी कन्याओं का विवाह कराओ, विद्यालय और बाग-बगीचों का निर्माण कराओ। ऐसे पुण्य कार्य करने से तुम्हारा लोक-परलोक सार्थक हो सकता है, परन्तु साधु की इन बातों से व्यापारी की पत्नी को ख़ुशी नहीं हुई। उसने कहा- मुझे ऐसे धन की आवश्यकता नहीं है, जिसे मैं दान दूं।
तब बृहस्पतिदेव बोले “यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो तुम एक उपाय करना। सात बृहस्पतिवार घर को गोबर से लीपना, अपने केशों को पीली मिटटी से धोना, केशों को धोते समय स्नान करना, व्यापारी से हजामत बनाने को कहना, भोजन में मांस-मदिरा खाना, कपड़े अपने घर धोना। ऐसा करने से तुम्हारा सारा धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर बृहस्पतिदेव अंतर्ध्यान हो गए।
व्यापारी की पत्नी ने बृहस्पति देव के कहे अनुसार सात बृहस्पतिवार वैसा ही करने का निश्चय किया। केवल तीन बृहस्पतिवार बीते थे कि उसी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई और वह परलोक सिधार गई। जब व्यापारी वापस आया तो उसने देखा कि उसका सब कुछ नष्ट हो चुका है। उस व्यापारी ने अपनी पुत्री को सांत्वना दी और दूसरे नगर में जाकर बस गया। वहां वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता। इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा।
एक दिन उसकी पुत्री ने दही खाने की इच्छा प्रकट की लेकिन व्यापारी के पास दही खरीदने के पैसे नहीं थे। वह अपनी पुत्री को आश्वासन देकर जंगल में लकड़ी काटने चला गया। वहां एक वृक्ष के नीचे बैठ अपनी पूर्व दशा पर विचार कर रोने लगा। उस दिन बृहस्पतिवार था। तभी वहां बृहस्पतिदेव साधु के रूप में सेठ के पास आए और बोले “हे मनुष्य, तू इस जंगल में किस चिंता में बैठा है?”
तब व्यापारी बोला “हे महाराज, आप सब कुछ जानते हैं।” इतना कहकर व्यापारी अपनी कहानी सुनाकर रो पड़ा। बृहस्पतिदेव बोले “देखो बेटा, तुम्हारी पत्नी ने बृहस्पति देव का अपमान किया था इसी कारण तुम्हारा यह हाल हुआ है लेकिन अब तुम किसी प्रकार की चिंता मत करो। तुम गुरुवार के दिन बृहस्पतिदेव का पाठ करो। दो पैसे के चने और गुड़ को लेकर जल के लोटे में शक्कर डालकर वह अमृत और प्रसाद अपने परिवार के सदस्यों और कथा सुनने वालों में बांट दो। स्वयं भी प्रसाद और चरणामृत लो। भगवान तुम्हारा अवश्य कल्याण करेंगे।”
साधु की बात सुनकर व्यापारी बोला “महाराज। मुझे तो इतना भी नहीं बचता कि मैं अपनी पुत्री को दही लाकर दे सकूं।” इस पर साधु जी बोले “तुम लकड़ियां शहर में बेचने जाना, तुम्हें लकड़ियों के दाम पहले से चौगुने मिलेंगे, जिससे तुम्हारे सारे कार्य सिद्ध हो जाएंगे।”
लकड़हारे ने लकड़ियां काटीं और शहर में बेचने के लिए चल पड़ा। उसकी लकड़ियां अच्छे दाम में बिक गई जिससे उसने अपनी पुत्री के लिए दही लिया और गुरुवार की कथा हेतु चना, गुड़ लेकर कथा की और प्रसाद बांटकर स्वयं भी खाया। उसी दिन से उसकी सभी कठिनाइयां दूर होने लगीं, परंतु अगले बृहस्पतिवार को वह कथा करना भूल गया।
अगले दिन वहां के राजा ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन कर पूरे नगर के लोगों के लिए भोज का आयोजन किया। राजा की आज्ञा अनुसार पूरा नगर राजा के महल में भोज करने गया। लेकिन व्यापारी व उसकी पुत्री तनिक विलंब से पहुंचे, अत: उन दोनों को राजा ने महल में ले जाकर भोजन कराया। जब वे दोनों लौटकर आए तब रानी ने देखा कि उसका खूंटी पर टंगा हार गायब है। रानी को व्यापारी और उसकी पुत्री पर संदेह हुआ कि उसका हार उन दोनों ने ही चुराया है। राजा की आज्ञा से उन दोनों को कारावास की कोठरी में कैद कर दिया गया। कैद में पड़कर दोनों अत्यंत दुखी हुए। वहां उन्होंने बृहस्पति देवता का स्मरण किया। बृहस्पति देव ने प्रकट होकर व्यापारी को उसकी भूल का आभास कराया और उन्हें सलाह दी कि गुरुवार के दिन कैदखाने के दरवाजे पर तुम्हें दो पैसे मिलेंगे उनसे तुम चने और मुनक्का मंगवाकर विधिपूर्वक बृहस्पति देवता का पूजन करना। तुम्हारे सब दुख दूर हो जाएंगे।
बृहस्पतिवार को कैदखाने के द्वार पर उन्हें दो पैसे मिले। बाहर सड़क पर एक स्त्री जा रही थी। व्यापारी ने उसे बुलाकार गुड़ और चने लाने को कहा। इसपर वह स्त्री बोली “मैं अपनी बहू के लिए गहने लेने जा रही हूं, मेरे पास समय नहीं है।” इतना कहकर वह चली गई। थोड़ी देर बाद वहां से एक और स्त्री निकली, व्यापारी ने उसे बुलाकर कहा कि हे बहन मुझे बृहस्पतिवार की कथा करनी है। तुम मुझे दो पैसे का गुड़-चना ला दो।
बृहस्पतिदेव का नाम सुनकर वह स्त्री बोली “भाई, मैं तुम्हें अभी गुड़-चना लाकर देती हूं। मेरा इकलौता पुत्र मर गया है, मैं उसके लिए कफन लेने जा रही थी लेकिन मैं पहले तुम्हारा काम करूंगी, उसके बाद अपने पुत्र के लिए कफन लाऊंगी।”
वह स्त्री बाजार से व्यापारी के लिए गुड़-चना ले आई और स्वयं भी बृहस्पतिदेव की कथा सुनी। कथा के समाप्त होने पर वह स्त्री कफन लेकर अपने घर गई। घर पर लोग उसके पुत्र की लाश को “राम नाम सत्य है” कहते हुए श्मशान ले जाने की तैयारी कर रहे थे। स्त्री बोली “मुझे अपने लड़के का मुख देख लेने दो।” अपने पुत्र का मुख देखकर उस स्त्री ने उसके मुंह में प्रसाद और चरणामृत डाला। प्रसाद और चरणामृत के प्रभाव से वह पुन: जीवित हो गया।
पहली स्त्री जिसने बृहस्पतिदेव का निरादर किया था, वह जब अपने पुत्र के विवाह हेतु पुत्रवधू के लिए गहने लेकर लौटी और जैसे ही उसका पुत्र घोड़ी पर बैठकर निकला वैसे ही घोड़ी ने ऐसी उछाल मारी कि वह घोड़ी से गिरकर मर गया। यह देख स्त्री रो-रोकर बृहस्पति देव से क्षमा याचना करने लगी।
उस स्त्री की याचना से बृहस्पतिदेव साधु वेश में वहां पहुंचकर कहने लगे “देवी। तुम्हें अधिक विलाप करने की आवश्यकता नहीं है। यह बृहस्पतिदेव का अनादार करने के कारण हुआ है। तुम वापस जाकर मेरे भक्त से क्षमा मांगकर कथा सुनो, तब ही तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी।”
जेल में जाकर उस स्त्री ने व्यापारी से माफी मांगी और कथा सुनी। कथा के उपरांत वह प्रसाद और चरणामृत लेकर अपने घर वापस गई। घर आकर उसने चरणामृत अपने मृत पुत्र के मुख में डाला| चरणामृत के प्रभाव से उसका पुत्र भी जीवित हो उठा। उसी रात बृहस्पतिदेव राजा के सपने में आए और बोले “हे राजन। तूने जिस व्यापारी और उसके पुत्री को जेल में कैद कर रखा है वह बिलकुल निर्दोष हैं। तुम्हारी रानी का हार वहीं खूंटी पर टंगा है।”
दिन निकला तो राजा रानी ने हार खूंटी पर लटका हुआ देखा। राजा ने उस व्यापारी और उसकी पुत्री को रिहा कर दिया और उन्हें आधा राज्य देकर उसकी पुत्री का विवाह उच्च कुल में करवाकर दहेज़ में हीरे-जवाहरात दिए।

बृहस्पतिवार व्रत कथा के लाभ |

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार बृहस्पतिवार/ गुरुवार को व्रत और कथा करना बृहस्पति/गुरु ग्रह को खुश करने और आशीर्वाद पाने का सबसे उत्तम उपाय है।

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Vishnu Mantra

Vishnu Mantra in Hindi/Sanskrit Lyrics

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् ।

लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

Vishnu Mool Mantra in Hindi/Sanskrit Lyrics

ॐ नमो नारायणाय।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

How to chant Vishnu Mantra

Benefits of Vishnu Mantra

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